छिन्दवाड़ा पी.एम. श्री शासकीय पी.जी. कॉलेज छिंदवाड़ा में गत दिवस मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद छिंदवाड़ा के माध्यम से संचालित समाजसेवा में स्नातक एवं स्नातकोत्तर बीएसडब्ल्यू और एमएसडब्ल्यू के विद्यार्थियों के लिए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सभी ने संकल्प लिया कि वे पॉलिथीन के विकल्प के रूप में जूट या कपड़े के थैले का उपयोग करेंगे।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि जन अभियान परिषद के जिला समन्वयक श्री अखिलेश जैन ने कहा कि स्वच्छता सरकार का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जन अभियान है। जन अभियान परिषद का जन्म ही इस सोच से हुआ है कि शासन की हर योजना तब तक अधूरी है, जब तक उसमें जन-जन की भागीदारी न हो। स्वच्छ भारत मिशन शौचालय बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे विचारों की स्वच्छता का मिशन है।
उन्होंने कहा कि आज गांव-गांव में प्रस्फुटन समितियां और नवांकुर संस्थाएं बनाई जा रही हैं। शासन अकेले जिले को साफ नहीं कर सकता। जब तक बीएसडब्ल्यू और एमएसडब्ल्यू का विद्यार्थी अपने गांव में जाकर लोगों को कचरा नाली में नहीं फेंकने के लिए जागरूक नहीं करेगा, तब तक बदलाव नहीं आएगा। जिला समन्वयक श्री जैन ने आगे कहा कि विद्यार्थी समाजसेवा पढ़ रहे हैं, इसका मतलब है कि वे नौकरी के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए पढ़ रहे हैं। उनके हाथ में दो डिग्रियां हैं, एक किताबी और दूसरी अनुभव की। विद्यार्थियों को फील्ड में जाकर देखना चाहिए कि आंगनबाड़ी में बच्चा कुपोषित क्यों है। स्वच्छता सीधे स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी हुई है।
कचरा नहीं, छुपा हुआ धन है – कार्यशाला के मुख्य वक्ता पर्यावरणविद एवं परामर्शदाता श्री विनोद तिवारी ने अपने उद्बोधन में कहा कि हम रोज मंदिर में अगरबत्ती जलाते हैं और प्रार्थना करते हैं कि घर पवित्र रहे, लेकिन उसी घर का पॉलिथीन वाला कचरा नाले में डाल देते हैं। नाला सीधे नदी में जाता है और नदी का पानी हमारे ही घर में आता है। इस तरह हम खुद अपने पानी में जहर घोल रहे हैं।
उन्होंने कहा कि वे लोगों को डराने नहीं, बल्कि जगाने आए हैं। भारत में हर व्यक्ति साल में 150 किलो कचरा पैदा करता है। छिंदवाड़ा जिला रोज 120 टन कचरा पैदा करता है। इस कचरे में 70 प्रतिशत गीला कचरा है, जिससे 45 दिन में सोना जैसी खाद बन सकती है। एक किलो किचन वेस्ट से 300 ग्राम खाद बनती है, जिसकी कीमत 15 रुपये है। हम रोज पैसे को कचरा गाड़ी में फेंक रहे हैं।
श्री तिवारी ने पांच सूत्र दिए। इनमें थाली में उतना ही भोजन लेना जितना खा सकें, अपने कचरे की जिम्मेदारी स्वयं लेना, प्लास्टिक को ना कहना, हर घर में कंपोस्ट पिट बनाना और इस कॉलेज को जीरो वेस्ट कैंपस बनाना शामिल है। उन्होंने कहा कि प्लास्टिक की एक थैली को गलने में 400 साल लगते हैं। गाय के पेट से 30 किलो प्लास्टिक निकलता है। हमारे द्वारा फेंका गया एक कप किसी की मौत का कारण बन सकता है।
महिलाओं की भागीदारी के बिना स्वच्छता अभियान अधूरा – परामर्शदाता श्रीमती लता नागले ने कहा कि घर की सफाई मां, बहन और पत्नी करती हैं। ऐसे में कचरा प्रबंधन की पहली गुरु भी वही हैं। महिलाओं की भागीदारी के बिना कोई अभियान सफल नहीं हो सकता। उन्होंने बताया कि जब वे गांवों में जाती हैं, तो महिलाएं पूछती हैं कि कचरा कहां फेंकें। वहीं से समाधान निकलता है। आज छिंदवाड़ा के कई गांवों में स्व-सहायता समूह की महिलाएं कचरे से उपयोगी वस्तुएं बना रही हैं। अखबार से पेपर बैग, बेकार बोतलों से गमले और पुराने कपड़ों से पायदान बनाए जा रहे हैं। कार्यशाला में श्रीमती तृप्ति सिंह एवं श्री एस. राव ने भी अपने विचार रखे। अंत में परामर्शदाता श्री आशीष साहू ने वक्ताओं, अतिथियों एवं छात्र-छात्राओं का हृदय से आभार व्यक्त किया।


