नई दिल्ली | 30 जनवरी 2026
देश की शिक्षा व्यवस्था में आज एक बड़ा और संवेदनशील मोड़ आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने छात्राओं के मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने साफ कहा कि किसी भी लड़की की पढ़ाई उसके पीरियड्स की वजह से बाधित नहीं होनी चाहिए।
न्यायालय ने सभी सरकारी और निजी स्कूलों को छात्राओं के लिए आवश्यक सुविधाएं अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। आदेश का पालन न करने पर सरकारी स्कूलों के प्राचार्य पर कार्रवाई होगी, वहीं निजी स्कूलों की मान्यता तक रद्द की जा सकेगी।
⚖️ दो टूक संदेश: शिक्षा से समझौता नहीं
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि मासिक धर्म से जुड़ी असुविधाएं छात्राओं की गरिमा, समानता और शिक्षा के अधिकार पर सीधा असर डालती हैं।
अदालत ने माना कि बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण कई छात्राएं स्कूल छोड़ने तक को मजबूर हो जाती हैं, जो संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन है।
🧾 जनहित याचिका से शुरू हुई बदलाव की राह
यह पूरा मामला सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. जया ठाकुर द्वारा दायर जनहित याचिका से सामने आया। याचिका में कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं के लिए मुफ्त सेनेटरी पैड, अलग शौचालय और जागरूकता कार्यक्रमों की मांग की गई थी।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने बताया कि मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर योजनाएं पहले से चल रही हैं, जिनमें जन औषधि केंद्रों से सस्ते पैड उपलब्ध कराना भी शामिल है।
🚨 तीन महीने में लागू होंगे निर्देश
अदालत ने Continuing Mandamus जारी करते हुए केंद्र और राज्यों को 3 महीने के भीतर ये व्यवस्थाएं लागू करने का आदेश दिया है—
हर स्कूल में पानी की सुविधा सहित अलग और कार्यशील शौचालय
कक्षा 6–12 की छात्राओं को मुफ्त सेनेटरी नैपकिन
स्कूलों में MHM कॉर्नर, आपातकालीन कपड़े और सुरक्षित कचरा निपटान
NCERT और SCERT को पाठ्यक्रम में विषय शामिल करने के निर्देश
पुरुष-महिला शिक्षकों और छात्रों के लिए संवेदनशीलता प्रशिक्षण
DEO द्वारा सालाना निरीक्षण और छात्राओं से गोपनीय फीडबैक
🏫 निजी स्कूल भी दायरे में
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निजी स्कूल भी इन नियमों से बाहर नहीं हैं। RTE अधिनियम के तहत मानकों का उल्लंघन करने पर स्कूल की मान्यता समाप्त की जा सकती है।
इन आदेशों की निगरानी की जिम्मेदारी NCPCR को सौंपी गई है।
📌 क्यों है यह फैसला खास?
क्योंकि यह सिर्फ सुविधा नहीं, सम्मान, समानता और शिक्षा की निरंतरता का सवाल है।
अब स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं, सुरक्षित और संवेदनशील माहौल भी बनेंगे।


