कटनी।
यह मामला किसी व्यक्ति, जाति, धर्म या राजनीतिक दल के विरुद्ध नहीं, बल्कि कानून के खुले उल्लंघन, प्रशासनिक मिलीभगत और एक गरीब परिवार के साथ हो रहे गंभीर अन्याय को जनता के सामने लाने का है। जिस ट्रस्ट के नाम पर मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 250 के तहत कार्रवाई करवाई गई, वही ट्रस्ट और उसके तथाकथित पदाधिकारी कानून की नजर में वैध ही नहीं हैं।
ट्रस्ट ही अवैध, फिर कार्रवाई कैसी?
तहसीलदार एवं अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) द्वारा प्रस्तुत जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से दर्ज है कि वर्तमान में कार्यरत तथाकथित “नई ट्रस्ट समिति” का कोई वैध पंजीयन प्रमाण उपलब्ध नहीं है। पुराने पंजीकृत पदाधिकारी या तो दिवंगत हो चुके हैं या पद पर नहीं हैं। नई समिति का गठन मध्यप्रदेश सार्वजनिक न्यास अधिनियम, 1951 के तहत वैधानिक रूप से नहीं किया गया है, जिससे यह ट्रस्ट कानून की दृष्टि में अस्तित्वहीन हो जाता है।
कानून के अनुसार कोई भी सार्वजनिक ट्रस्ट तभी वैध माना जाता है जब उसका विधिवत पंजीयन हो और पदाधिकारी विधिसम्मत तरीके से नियुक्त हों। अपंजीकृत या अवैध ट्रस्ट को न तो संपत्ति पर अधिकार होता है और न ही किसी व्यक्ति के विरुद्ध राजस्व या कानूनी कार्रवाई कराने का।
जालसाजी के आरोपी बने शिकायतकर्ता
गंभीर तथ्य यह है कि जिन लोगों ने स्वयं को ट्रस्ट का पदाधिकारी बताकर धारा 250 की कार्रवाई करवाई, उन्हीं के विरुद्ध कोतवाली थाना कटनी में FIR दर्ज है। इसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467, 468, 471 (जालसाजी से संबंधित धाराएं) और 403 (आपराधिक गबन) जैसी गंभीर धाराएं शामिल हैं। ऐसे आरोपों से घिरे व्यक्तियों द्वारा गरीब परिवार को बेदखल करने की कोशिश न्याय नहीं बल्कि खुला दमन प्रतीत होती है।
ब्लैक-लिस्ट योग्य, फिर भी प्रशासनिक कार्रवाई
तहसीलदार की जांच रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि ट्रस्ट के तथाकथित पदाधिकारी ब्लैक-लिस्ट किए जाने योग्य पाए गए हैं, ट्रस्ट का संचालन अवैधानिक है और मंदिर/भूमि का प्रबंधन प्रशासन के अधीन लिया जाना चाहिए। इसके बावजूद उन्हीं लोगों की शिकायत पर धारा 250 की कार्रवाई किया जाना प्रशासन के दोहरे चरित्र और गंभीर लापरवाही को उजागर करता है।
धारा 250 की कार्रवाई प्रारंभ से ही शून्य
मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 250 तभी लागू हो सकती है जब आवेदनकर्ता वैध, निर्विवाद और कानूनन मान्य भूमिधर या अधिकृत प्रबंधक हो। इस प्रकरण में न तो ट्रस्ट वैध है, न पदाधिकारी कानूनन मान्य हैं और न ही उनका अधिकार निर्विवाद है। ऐसे में यह पूरी कार्रवाई कानून की दृष्टि में प्रारंभ से ही शून्य (Void ab initio) मानी जाती है।
हाईकोर्ट से स्टे न मिलने की सच्चाई
इस प्रकरण में हाईकोर्ट द्वारा अंतरिम स्टे न दिया जाना प्रशासन या ट्रस्ट की कार्रवाई को वैध नहीं ठहराता। न्यायालय ने यह माना कि संबंधित भूमि पर पूर्व में सीमांकन की कार्रवाई हो चुकी थी और उन आदेशों को समय रहते चुनौती नहीं दी गई थी। इसी प्रक्रियात्मक आधार पर स्टे नहीं दिया गया, न कि मामले के वास्तविक गुण-दोष के आधार पर।
महत्वपूर्ण यह भी है कि हाईकोर्ट के समक्ष ट्रस्ट के अपंजीकृत होने के दस्तावेज, पदाधिकारियों के विरुद्ध दर्ज FIR तथा ब्लैक-लिस्ट संबंधी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई थी। तथ्य छुपाकर प्राप्त किया गया कोई भी आदेश अंतिम नहीं माना जा सकता।
जनता के सामने उठते सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि
क्या एक अवैध ट्रस्ट कानून से ऊपर है?
क्या जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोपी लोगों को गरीब परिवारों को उजाड़ने का अधिकार दिया जा सकता है?
क्या प्रशासन का दायित्व न्याय करना है या अवैध तत्वों को संरक्षण देना?
संघर्ष जमीन का नहीं, संविधान का
यह मामला केवल जमीन का नहीं, बल्कि कानून, न्याय और संविधान की आत्मा को बचाने का संघर्ष है। यदि आज एक गरीब परिवार के साथ इस तरह अन्याय किया गया, तो कल कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा।



