एमपी की सियासत में हलचल, बड़े नामों पर मंडराया संकट!
मध्य प्रदेश की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में प्रवेश करती दिख रही है। मंत्रिमंडल में बड़े बदलाव की चर्चाएं तेज हैं और इस बार निशाने पर हैं सरकार के दो प्रभावशाली चेहरे—कैलाश विजयवर्गीय और विजय शाह। हालिया घटनाक्रम ने इन अटकलों को और हवा दे दी है।
झंडारोहण सूची से बाहर हुए कैलाश विजयवर्गीय, सवाल बरकरार
गणतंत्र दिवस पर झंडारोहण करने वाले मंत्रियों की जारी सूची में वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का नाम न होना सियासी हलकों में चर्चा का विषय बन गया।
हालांकि विजयवर्गीय की ओर से यह सफाई दी गई कि पारिवारिक शोक के कारण वे अवकाश पर हैं, लेकिन राजनीतिक जानकार इसे हाल के विवादों से जोड़कर देख रहे हैं।
इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल का मामला हो या फिर पत्रकारों को लेकर दिया गया उनका चर्चित बयान—इन घटनाओं ने उनकी मुश्किलें बढ़ाई हैं। माना जा रहा है कि शीर्ष नेतृत्व उनके बयानों से खुश नहीं है।
विजय शाह पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, सरकार पर दबाव
दूसरी ओर कैबिनेट मंत्री विजय शाह की स्थिति और ज्यादा नाजुक मानी जा रही है।
सेना की अधिकारी सोफिया कुरैशी से जुड़े पुराने बयान के मामले में सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी ने राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
कोर्ट ने एसआईटी रिपोर्ट के बावजूद कार्रवाई न होने पर नाराजगी जाहिर की है। जानकारों का कहना है कि अब सरकार के लिए विजय शाह को मंत्रिमंडल में बनाए रखना आसान नहीं होगा।
सत्ता के भीतर समीकरण बदलते?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सत्ता के भीतर शक्ति संतुलन बदल रहा है।
इंदौर जैसे बड़े राजनीतिक केंद्र में जहां कभी कैलाश विजयवर्गीय का दबदबा माना जाता था, अब वहां मुख्यमंत्री की सक्रियता बढ़ती दिख रही है।
विजयवर्गीय का धार जैसे संवेदनशील जिले से दूरी बनाए रखना और लंबा अवकाश—इन सबको उनके घटते प्रभाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
मंत्रिमंडल विस्तार की तैयारी, नए चेहरों की एंट्री संभव
सूत्रों के मुताबिक जल्द ही मंत्रिमंडल विस्तार की कवायद तेज हो सकती है।
फिलहाल चार मंत्री पद खाली हैं और खराब प्रदर्शन या विवादों में घिरे मंत्रियों पर गाज गिरने की पूरी संभावना है।
युवाओं, महिलाओं और नए चेहरों को मौका देने की रणनीति पर भी विचार हो रहा है। वहीं कुछ वरिष्ठ नेताओं की वापसी की चर्चा भी चल रही है।
हालांकि, अंतिम मुहर हमेशा की तरह दिल्ली से ही लगेगी।
वेट एंड वॉच मोड में एमपी की राजनीति
26 जनवरी के बाद मध्य प्रदेश की कैबिनेट की तस्वीर बदलेगी या नहीं—इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं।
फिलहाल सियासी गलियारों में सिर्फ एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या सचमुच बड़े फेरबदल का समय आ गया है?


