भगवान् श्रीकृष्ण का रुक्मिणी से विवाह एक दिलचस्प प्रसंग है, जिसके अनुसार रुक्मिणी ने जब श्रीकृष्ण के बारे में सुना, तो वो उनके व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुईं कि …
उन्होंने श्रीकृष्ण को अपना पति मान लिया, लेकिन उनके भाई रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से करना चाहते थे। इसलिए, रुक्मिणी ने भगवान् श्रीकृष्ण को एक प्रेम पत्र लिखा और इसमें रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को अपना पति बनाने की प्रार्थना की और
उनसे आग्रह किया कि वे आकर उनका हरण करें क्योंकि उनके भाई ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया था। उस प्रेम पत्र के बाद श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी को उनके विवाह मंडप से ही भगा लिया और उनसे विवाह कर लिया।
हालांकि, शास्त्रों के अनुसार यह विवाह राक्षस विवाह की श्रेणी में आया क्योंकि इस विवाह में माता-पिता की रजामंदी नहीं थी लेकिन यह विवाह पौराणिक कथाओं में एक दिलचस्प प्रसंग के रूप में दर्ज हो गया।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि रुक्मिणी ने अपने ख़त में भगवान् श्रीकृष्ण क ऐसा क्या लिखा, जिसके बाद श्रीकृष्ण उनसे विवाह करने क लिए आतुर हो उठे थे।
श्रीमद्भागवतम् के दशम स्कंध (अध्याय 52–54) में रुक्मिणी का श्रीकृष्ण को लिखा प्रेम पत्र वर्णित है। तो, चलिए जानते हैं इस प्रेम पत्र का कुछ हिस्सा…
रुक्मिणी का प्रेम पत्र :
पत्र में रुक्मिणी ने लिखा था कि ‘हे कृष्ण! मैं विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी हूँ। आपके गुण, आपका सौंदर्य और आपके शौर्य को सुनकर मैं मन, बुद्धि और आत्मा से आपको ही अपना पति मान चुकी हूँ’।
रुक्मिणी ने आगे लिखा कि मेरे भाई रुक्मी ने अहंकारवश मेरा विवाह शिशुपाल से तय किया है परंतु हे भगवन! यदि आप मेरे प्रति करुणा करें, तो मुझे इस विवाह से बचाकर ले जाएं। यदि आपने मुझे स्वीकार न किया, तो यह जीवन मेरे किसी काम का नहीं रहेगा।
अतः हे माधव! मेरी प्रार्थना है कि आप विदर्भ आइए और राक्षसी शक्तियों को नष्ट करने वाले नरसिंह की भाँति शत्रुओं को जीतकर मुझे अपने साथ द्वारका ले जाइए।
यदि आप मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार करेंगे, तो मैं जन्म-जन्मांतर तक आपकी दासी बनकर आपकी सेवा करती रहूँगी। रुक्मिणी ने ख़त में कहा कि यदि श्रीकृष्ण उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे तो वे अपना जीवन त्याग देंगी।
पत्र में उन्होंने योजना बताई कि वे उसे अंबिका मंदिर से ले जा सकते हैं, जहां वह पूजा के लिए जाएगी। श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का पत्र पढ़ा और तुरंत विदर्भ जाने का निश्चय किया। उन्होंने रथ पर सवार होकर विदर्भ की ओर प्रस्थान किया।
रुक्मिणी अपनी योजना के अनुसार माता अंबिका (पार्वती) के मंदिर में पूजा करने गईं। जैसे ही रुक्मिणी मंदिर से बाहर आईं, श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी को अपने रथ में बैठा लिया और तेजी से वहां से निकल गए।
रुक्मिणी के भाई रुक्मी ने अपनी सेना के साथ श्रीकृष्ण का पीछा किया। लेकिन युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मी को पराजित कर दिया।


