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कटनी जिले के रीठी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अंतर्गत आने वाले उप-स्वास्थ्य केंद्रों और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स की हकीकत बेहद चौंका देने वाली है। स्वास्थ्य सेवाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाने के उद्देश्य से सरकार द्वारा करोड़ों की लागत से तैयार किए गए इन आरोग्य मंदिर (केंद्रों) में न तो आवश्यक संसाधन हैं और न ही उचित निगरानी व्यवस्था। स्थिति यह है कि इन केंद्रों पर की जाने वाली 17 प्रकार की अनिवार्य जांचों में से अधिकांश जांच होती ही नहीं है जबकि जिला स्वास्थ्य अधिकारी ने मीटिंग के दौरान सभी सीएचओ निर्देशित किया था की क्षेत्र में सभी जांच पूर्ण करनी है होगी । और ग्रामीणों की सेहत से सीधा खिलवाड़ न हो।
रीठी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले स्वास्थ्य केंद्रों मैं ,देवरीकला, निट्ठर्रा, इमलाज, उमरिया, अमगवा, गुरजीकला, रुडमूड, मझगवां, हथकुरी,बडखेरा, वसुधा,परोहापिपरिया,देवगांव,
रेपुरा, बखलेहटा,बड़ागांव, में केंद्रों मैं स्वास्थ्य अधिकारियों नियुक्ति, प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को बेहतर करना और छोटे-छोटे लक्षणों की जांच कर समय रहते मरीजों को इलाज देने तथा बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए की गई है।
परंतु स्थानीय सूत्रों और ग्रामीणों से मिली जानकारी के अनुसार, ये अधिकारी अधिकांश समय शहरों में रहते हैं और अपने तैनाती स्थल पर नियमित नहीं आते। सीएचओ के कार्यस्थल पर न होने की स्थिति में ग्रामीणों को मजबूरीवश झोला छाप डॉक्टरों की शरण लेनी पड़ती है। इससे न केवल गलत दवाइयों का सेवन बढ़ रहा है, बल्कि गंभीर बीमारियों की अनदेखी भी हो रही है।
हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स में 17 प्रकार की बेसिक जांचें की जानी आवश्यक हैं। इनमें शामिल हैं: एचबी ऐस्टीमेशन, यूरीन प्रेगनेंसी टेस्ट (एचसीजी), यूरीन एल्बुमिन, यूरिन शुगर, ब्लड शुगर, मलेरिया टेस्ट बाय किट, थायराइड टेस्ट बाय किट, हेपेटाइटिस बी इन्फेक्शन, स्पूटम फॉर हेप्पी टाइटस बी इन्फेक्शन, (सैंपल कलेक्शन), आयोडीन साल्ट टेस्ट, वॉटर टेस्टिंग फॉर फैसियल कॉन्टेमिनेशन, यूरिन टेस्ट, एचआईवी एंटीबॉडीज टू एचआईवी 1 और 2, डेंगू, रैपिड टेस्ट किट फॉर सिफीलिस, एंटी एचसीबी एंटीबॉडी रैपिड किट फॉर हेपिटाइटिस सी इन्फेक्शन, स्मैर फार फाइलेरायसिस. अस्पतालों में जिले, संभाग, प्रदेश, और केंद्र से जाँच दल आता है तो क्या इनकी जाँच सिर्फ कागजो तक ही होती है. लेकिन इन जांचों के लिए आवश्यक किट, उपकरण और सामग्री अधिकांश केंद्रों में उपलब्ध ही नहीं हैं। कई केंद्रों में तो केवल 2-3 प्रकार की जांच ही होती हैं, बाकी सिर्फ कागजों में दर्शाई जाती हैं।
सूत्रों के मुताबिक सीएचसी रीठी में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही और अधिकारियों की मिलीभगत से महंगे जांच उपकरणों को गायब कर दिया गया है या उन्हें निजी प्रयोग के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। किसी भी केंद्र में थायराइड टेस्टिंग किट, डेंगू या हेपेटाइटिस सी की रैपिड टेस्ट किट जैसी जांच सामग्री नहीं पाई गई। जब निरीक्षण टीम या अधिकारी आते हैं, तब इन्हें दिखाने के लिए कागजी खानापूर्ति कर ली जाती है।
स्वास्थ्य केंद्रों की बदहाल स्थिति का सबसे ज्यादा फायदा झोला छाप डॉक्टरों को हो रहा है। गाँव-गाँव में सक्रिय ये अवैध चिकित्सक न केवल झूठे इलाज करते हैं, बल्कि नकली दवाइयाँ देकर ग्रामीणों की जान से भी खेलते हैं।
इन हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स के संचालन और रखरखाव के लिए सरकार की ओर से लाखों रुपये सालाना भेजे जाते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि उन पैसों का कोई सही हिसाब-किताब नहीं है। सीएचओ द्वारा की जाने वाली गतिविधियों, जांच, आउटडोर मरीजों की संख्या, जांच रिपोर्ट आदि सब कुछ कागजों तक सीमित है।
बीएमओ कार्यालय द्वारा भी इन केंद्रों की नियमित निगरानी नहीं की जा रही है। जिला स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों द्वारा कभी-कभी निरीक्षण तो किया जाता है, लेकिन वह भी पूर्व नियोजित होता है, जिससे सेंटर पहले से सज-धज कर तैयार रहते हैं।
स्वास्थ्य केंद्रों का उद्देश्य था ग्रामीण जनता को सुलभ, सस्ता और गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक इलाज देना, लेकिन यह उद्देश्य प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्टाचार और जवाबदेही के अभाव में खो गया है। अगर स्थिति में जल्द सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में ग्रामीण क्षेत्र में बीमारियों का बोझ बढ़ेगा, और यह पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करेगा।
हरिशंकर बेन


