कटनी जिले के बांधा-इमलाज गांव में मौजूद श्री राधा-कृष्ण मंदिर अपने आप में इतिहास, कला और लोकआस्था का अनोखा संगम है। बिलहरी की ऐतिहासिक नगरी से करीब 10-12 किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर अपनी बारीक पत्थर की कारीगरी और इससे जुड़ी रोचक जनश्रुतियों के कारण आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
मंदिर के निर्माण की कहानी भी अपने आप में प्रेरणादायक है। स्थानीय बुजुर्गों के मुताबिक गांव के तत्कालीन मालगुजार पंडित गोरेलाल पाठक ने मंदिर बनवाने का संकल्प लिया और इसकी नींव रखवाई। हालांकि, उनका निधन कम उम्र में ही हो गया और मंदिर निर्माण का सपना अधूरा रह गया।
इसके बाद उनकी पत्नियों भगौता देवी और पूना देवी ने इस संकल्प को पूरा करने का जिम्मा अपने ऊपर लिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार दोनों श्रीकृष्ण को पुत्र और राधारानी को पुत्रवधू के रूप में मानती थीं। इसी भाव के साथ उन्होंने मंदिर निर्माण का काम आगे बढ़ाया।
बताया जाता है कि मंदिर का निर्माण वर्ष 1915 में शुरू हुआ और करीब नौ साल बाद 1924 में पूरा हुआ। उस समय इसके निर्माण पर लगभग 15 हजार रुपये खर्च हुए थे। इसके अलावा मालगुजारी से मिलने वाले करीब 11 वर्षों के अनाज को बेचकर प्राप्त धन भी मंदिर निर्माण में लगाया गया था।
निर्माण पूरा होने के करीब दो साल बाद, 1926 में श्री राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा कराई गई। इसके बाद यह मंदिर आसपास के क्षेत्र में आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
जब बांस के पेड़ से सुनाई देने लगी बांसुरी
इस मंदिर से जुड़ी सबसे अनोखी कहानी वर्ष 1928 की बताई जाती है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि भादों के दिनों में लगातार सात दिन बारिश हुई थी। इसी दौरान मंदिर परिसर में लगे एक बांस के पेड़ से लगातार तीन दिनों तक बांसुरी जैसी मधुर ध्वनि सुनाई देती रही।
इस खबर के फैलते ही बड़ी संख्या में ग्रामीण मंदिर परिसर में पहुंचने लगे। बुजुर्गों के अनुसार लोग इस धुन को सुनने में इतने तल्लीन हो जाते थे कि उन्हें खाने-पीने और आराम करने तक का ध्यान नहीं रहता था।
इसी घटना के बाद इस स्थान को श्रद्धालुओं के बीच ‘लघु वृंदावन’ के नाम से पहचान मिलने की बात कही जाती है। आज भी गांव के बुजुर्ग इस प्रसंग को श्रद्धा के साथ सुनाते हैं।
पत्थरों पर दिखाई देती है कारीगरों की बेमिसाल कला
मंदिर की खूबसूरती का सबसे बड़ा आकर्षण इसकी पत्थर की नक्काशी है। मंदिर में मौजूद कलाकृतियां उस दौर के शिल्पकारों की दक्षता की कहानी कहती हैं।
स्थानीय जानकारी के अनुसार बिलहरी के प्रसिद्ध कलाकार बादल खान ने मंदिर के पत्थरों को कलात्मक रूप देने में अहम भूमिका निभाई थी। सरजू बर्मन और भिम्मे नामक कारीगरों का योगदान भी मंदिर निर्माण से जोड़ा जाता है।
बताया जाता है कि मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल हुआ पत्थर सैदा गांव से लाया गया था। उस समय आज जैसी परिवहन व्यवस्था नहीं थी, इसलिए पत्थरों को बैलगाड़ियों के जरिए निर्माण स्थल तक पहुंचाया गया।
एक स्थानीय जनश्रुति यह भी है कि निर्माण कार्य पूरा होने के बाद पत्थर ढोने में इस्तेमाल की गई बैलगाड़ी में जुते भैंसे ने मंदिर की सीढ़ियों के पास ही दम तोड़ दिया था।
विरासत जिसे संभालने की जरूरत
बांधा-इमलाज का श्री राधा-कृष्ण मंदिर आज करीब एक सदी से भी अधिक पुराने इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। यह केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि उस दौर की स्थापत्य कला, शिल्प परंपरा और धार्मिक समर्पण का प्रमाण भी है।
मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई नक्काशी, निर्माण से जुड़ी पारिवारिक कहानी और बांस से बांसुरी की धुन सुनाई देने जैसी लोककथाएं इसे सामान्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती हैं।
कटनी की इस धरोहर में आस्था के साथ इतिहास और लोककला भी दिखाई देती है। यही वजह है कि बांधा-इमलाज का यह मंदिर आज भी स्थानीय लोगों के लिए श्रद्धा का केंद्र है और आने वाली पीढ़ियों के लिए क्षेत्र की पुरानी सांस्कृतिक विरासत की एक महत्वपूर्ण निशानी बना हुआ है।
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