हिंदी और आज अन्य भाषाओं को लेकर अपनी मूल भाषा हिन्दी को भूलते जा रहे हैं। यही कारण है कि आज विश्व हिन्दी दिवस आयोजित किए जाते हैं लेकिन उसमें लोगों का उतना रुझान नहीं रहता लेकिन जो हिन्दी भाषा का महत्व समझते हैं।जेकेएएसीएल ने विश्व हिन्दी दिवस पर साहित्यिक कार्यक्रम
आयोजित किया। जम्मू-कश्मीर कला,संस्कृति एवं भाषाएं अकादमी ने आज विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में एक व्यापक साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किया,जिसके माध्यम से अकादमी ने हिन्दी भाषा के संवर्धन,प्रसार और समृद्धि हेतु अपने संकल्प को पुनः सुदृढ़ किया।
कार्यक्रम में बोलते हुए जेकेएएसीएल की सचिव, सुश्री हरविंदर कौर ने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी भाषा के बढ़ते महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिन्दी केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि एक सशक्त सांस्कृतिक कड़ी है, जो देश के कोने-कोने में बसे लोगों को जोड़ती है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक बनकर उभरी है। और भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर,मूल्य एवं साहित्यिक परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अभिव्यक्त करने का प्रभावी साधन है।
सुश्री कौर ने आगे कहा कि विश्व हिन्दी दिवस हिन्दी भाषा की भूमिका पर विचार करने का अवसर प्रदान करता है — विशेषकर राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक सौहार्द और विविध भाषाई समुदायों के बीच परस्पर समझ को बढ़ाने में इसकी अहम भूमिका है। उन्होंने युवा पीढ़ी में हिन्दी को बढ़ावा देने तथा क्षेत्रीय एवं मातृभाषाओं के साथ इसके स्वस्थ सह-अस्तित्व को सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया,जिससे भारत की बहुभाषा-सम्पन्न संरचना और अधिक सुदृढ़ हो।
कार्यक्रम में एक आकर्षक काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें प्रतिष्ठित हिन्दी कवियों ने सामाजिक मूल्य, मानवीय संवेदनाएँ,राष्ट्रीय चेतना तथा समकालीन परिस्थितियों सहित अनेक विषयों पर अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। इस सत्र ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया और यह सिद्ध किया कि हिन्दी साहित्य न केवल जीवंत है। बल्कि कालातीत एवं आधुनिक दोनों प्रकार के सरोकारों को अभिव्यक्त करने में पूर्णतः सक्षम भी है।
काव्य-गोष्ठी में जिन कवियों ने भाग लिया,उनमें पुरषोत्तम कुमार,शेख मोहम्मद कल्याण, संजीव भसीन,अल्का शर्मा, अमिता मेहता,यशपाल यश, हीना महाजन,सुरिंदर सिंह,डॉ. पवन खजूरिया,रंजीत,सुमन शर्मा,डॉ. इंदु भूषण बाली, देविंदर तथा संजय कपिल शामिल थे। उनकी प्रस्तुतियों को साहित्यिक गंभीरता, भावनात्मक प्रभाव शीलता और सांस्कृतिक महत्व के लिए व्यापक सराहना प्राप्त हुई।
और ऐसे बीच बीच कार्यक्रम आयोजित किए जाना चाहिए जिससे आने वाली जनरेशन अपनी मूल भाषा हिन्दी को जिंदा रखें।
आईए सुनें क्या कहा कवियों ने अपनी कविता के माध्यम से।
आप देख रहे हैं एमपी न्यूज कास्ट के माध्यम से संपादकीय रिपोर्ट।


