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Home मध्यप्रदेश मंडला

*विचारणीय विषय : शिक्षक मानसिक रूप से परेशान — एक गहरी चिंता* शिक्षक को शिक्षण नहीं, प्रमाण और पोर्टलों का बोझ सौंंप दिया गया है; परिणामस्वरूप शिक्षा का मानवीय पक्ष खो रहा है

by Manish Gautam Chiefeditor
October 29, 2025
in मंडला
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*लेखक – कृष्ण कुमार हरदहा*
प्राचार्य, पीएम श्री शासकीय हाई स्कूल सेमरखापा, मंडला

शिक्षा व्यवस्था में आज एक मौन पीड़ा जन्म ले चुकी है।
शिक्षक थक चुके हैं, निराश हैं और मानसिक रूप से टूटने लगे हैं।
कभी जो शिक्षक कक्षा में बच्चों के साथ ज्ञान बाँटने में आत्मसंतोष पाता था,
वह अब रिपोर्टिंग, अपलोडिंग और औपचारिकताओं के जाल में उलझ गया है।

*कागज़ी काम और पोर्टल अपलोड की मार*

अब शिक्षक का दिन “फ़ोटो भेजो”, “रिपोर्ट अपलोड करो”, “प्रमाण दो” जैसे आदेशों में बीतता है।
SQAF, यू-डाइस, शिक्षा 3.0, इंग्लिश ओलिंपियड, मोगली उत्सव, स्वच्छता पखवाड़ा, खेलकूद, इको क्लब, बालसभा —
हर गतिविधि की दो फ़ोटो, एक वीडियो और रिपोर्ट अपलोड करना शिक्षक का दैनंदिन कार्य बन गया है।
पढ़ाना अब द्वितीयक कार्य बन गया है,
जबकि डेटा प्रबंधन मुख्य जिम्मेदारी बन गया है।

*तकनीकी बोझ और दिखावे की दौड़*

हर काम में डिजिटल टूल्स और ऐप्स की अनिवार्यता
शिक्षण को संवेदनहीन और यांत्रिक बना रही है।
इवेंट्स और अभियानों की भरमार ने स्थिति और बिगाड़ दी है —
अब यह नहीं देखा जाता कि बच्चे कितना सीख रहे हैं,
बल्कि यह कि कितनी गतिविधियाँ हुईं और कितनी रिपोर्ट भेजी गईं।

*ग्रामीण शिक्षकों की सच्चाई*

ग्रामीण विद्यालयों में तो दो-तीन शिक्षक ही सैकड़ों विद्यार्थियों की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
वे पढ़ाने के साथ-साथ मिड-डे मील, छात्रवृत्ति, गणवेश व साइकिल वितरण, यू-डाइस फीडिंग, पालन प्रतिवेदन, रिपोर्ट रजिस्टर —
सब कार्य कर रहे हैं।
अब वे शिक्षक कम और बहुद्देशीय कर्मचारी अधिक बन गए हैं।

*तनाव और सम्मान का संकट*

लगातार निगरानी, हर कार्य का प्रमाण और हर बात पर शंका —
इन सबने शिक्षक से उसका आत्मसम्मान छीन लिया है।
अभिभावकों की अपेक्षाएँ, विद्यार्थियों का बदलता व्यवहार
और प्रशासनिक दबाव ने उसे मानसिक रूप से थका दिया है।

*अब आवश्यक है गंभीर चिंतन*

शिक्षा का केंद्र रिपोर्ट और आंकड़े नहीं,
बल्कि शिक्षक और छात्र होना चाहिए।
यदि शिक्षक को सम्मान, भरोसा और मानसिक स्वतंत्रता नहीं मिली,
तो आने वाली पीढ़ी निर्जीव शिक्षा की शिकार होगी।

हमें शिक्षक के मन को समझना होगा,
क्योंकि यदि शिक्षक मानसिक रूप से टूट गया —
तो विद्यालय तो रहेगा, पर शिक्षा नहीं।

Manish Gautam Chiefeditor

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