दीपावली से 15-20 दिन पहले, जब पूरा देश पटाखों के प्रदूषण पर बहस कर रहा था, सोशल मीडिया पर एक नया ‘इनोवेशन’ धूम मचा रहा था। इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर वीडियो वायरल हो रहे थे, जहां युवा कंटेंट क्रिएटर्स PVC पाइप से बनी ‘कार्बाइड गन’ को ‘इको-फ्रेंडली टॉय’ बता रहे थे। एक रील में दिखाया गया: दुकानदार सड़क किनारे चादर बिछाकर दुकान सजाते, पानी से भरे पाइप में कैल्शियम कार्बाइड (फल पकाने वाला केमिकल) डालते, पत्थर का टुकड़ा मिलाते, हिलाते और फिर लाइटर से आग लगाते। धमाके की आवाज पर कैप्शन: “देसी रॉकेट! प्रदूषण फ्री, सिर्फ 200 रुपये!”
ये वीडियो 5-10 लाख व्यूज बटोर रहे थे। एक क्रिएटर ने लिखा, “बच्चों के लिए सेफ फन-पटाखों का विकल्प!” लेकिन हकीकत? कार्बाइड पानी में मिलकर एसिटिलीन गैस पैदा करता है, जो आग लगने पर रॉकेट की तरह उड़ता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह गैस इतनी ज्वलनशील है कि छोटी सी चिंगारी से विस्फोट हो जाता है, जो आंखों और चेहरे को झुलसा देती है। गुजरात के भवनगर में भी इसी ट्रेंड से बच्चों की आंखें फटीं, और वहां बिक्री पर बैन लग गया। MP में दुकानें सड़कों पर उभरीं-भोपाल के कोलार रोड से लेकर इंदौर के बाजारों तक। एक दुकानदार ने दावा किया, “ये तो देसी जुगाड़ है, कोई खतरा नहीं!” लेकिन अब ये ‘जुगाड़’ सैकड़ों परिवारों का दुश्मन बन चुका है।
हादसों का सिलसिला: 200+ बच्चे शिकार, आंखों की रोशनी गई-परिवारों का शोक
दीपावली की रात और उसके बाद के दिनों में MP के अस्पताल घायलों से भर गए। भोपाल के AIIMS में बर्न्स डिपार्टमेंट में 55 से ज्यादा केस दर्ज हुए, जिनमें 23 बच्चों को कार्बाइड गन से चोटें लगीं-ज्यादातर आंखों और चेहरों पर। विदिशा में 5 बच्चे अस्पताल पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने चेतावनी दी कि एसिटिलीन गैस से कॉर्निया जल जाता है, और 70% मामलों में स्थायी अंधापन हो जाता है। ग्वालियर के जयारोग्य अस्पताल में 40+ बच्चे भर्ती-कई के चेहरे झुलस गए, हाथों में फ्रैक्चर। इंदौर के महाराजा यशवंत रा अस्पताल में एक 6 साल के बच्चे की आंख फट गई, जिसकी सर्जरी के बावजूद रोशनी लौटने की उम्मीद कम है।
एक मां ने रोते हुए बताया, “रील देखकर बेटे ने मांगा था। 200 रुपये में खरीदी, लेकिन अब उसकी एक आंख बंद।” कुल आंकड़ों में 200+ बच्चे प्रभावित, जिनमें 30% को ICU में रखा गया।
कार्बाइड गन सरल लगती है, लेकिन घातक है। PVC पाइप (जो सस्ता प्लंबिंग मटेरियल है) को एक छोर से बंद कर लेते हैं, फिर इसमें कैल्शियम कार्बाइड डालते हैं। पानी मिलाने पर प्रतिक्रिया होती है: CaC₂ + 2H₂O → C₂H₂ + Ca(OH)₂। इससे एसिटिलीन गैस (C₂H₂) निकलती है, जो लाइटर से जलकर तेज धमाके से बाहर उड़ जाती है। लेकिन समस्या? गैस का प्रेशर अनियंत्रित होता है-छोटी गलती से पाइप फट सकता है, या गैस आंखों में घुसकर जला सकती है।
डॉ अनिल वर्मा, नेत्र विशेषज्ञ (AIIMS भोपाल) ने बताया, “एसिटिलीन गैस आंख की कॉर्निया को 90% तक जला देती है। बच्चे सेफ्टी गियर नहीं पहनते, इसलिए खतरा दोगुना।” एक रिपोर्ट में कहा गया कि पटाखा बैन के बाद लोग घर पर ही ‘पाइप गन’ बना रहे हैं, जो सल्फर-पोटाश मिश्रण से और खतरनाक हो जाती है। X पर एक पोस्ट में चेतावनी दी गई: “ये खिलौना नहीं, हादसा है। बच्चे को दूर रखो!”
प्रशासन की कार्रवाई: दुकानें बंद, लेकिन जागरूकता की कमी
मध्य प्रदेश सरकार ने अलर्ट जारी किया। भोपाल डीएम ने दुकानों पर छापे मारे, 500+ गन्स जब्त। विदेश में 20 दुकानदारों पर एफआईआर। ग्वालियर और इंदौर में बैन लगाया गया। स्वास्थ्य विभाग ने हेल्पलाइन शुरू की: “पटाखों से बचें, सुरक्षित दीवाली मनाएं।” लेकिन पैरेंट्स का आरोप: “स्कूलों में जागरूकता क्यों नहीं?” एक एनजीओ ने कैंप लगाए, जहां 100+ परिवारों को काउंसलिंग दी गई।
शहर,घायल बच्चे,मुख्य चोटें,कार्रवाई
- भोपाल,23,”आंखें, चेहरा झुलसना”,200+ दुकानें सील
- विदिशा,15,नेत्र हानि,5 दुकानदार गिरफ्तार
- ग्वालियर,80,”हाथ फ्रैक्चर, जलन”,स्पेशल स्क्वॉड तैनात
- इंदौर,82,स्थायी अंधापन,”हेल्थ कैंप, 300 गन्स जब्त”
विशेषज्ञों की चेतावनी: ‘ये खिलौना नहीं, बम है!’-रोकथाम के टिप्स
डॉ सुनील कुमार, बाल रोग विशेषज्ञ: “बच्चों में उत्सुकता ज्यादा, लेकिन समझ कम। पैरेंट्स सुपरवाइज करें।” रोकथाम के उपाय:
- दुकानों पर नजर: विक्रेता दिखें तो 100 नंबर पर कॉल।
- सोशल मीडिया चेक: रील्स देखने से पहले डिस्क्लेमर पढ़ें।
- मेडिकल मदद: चोट लगे तो आंख धोएं, तुरंत


