शनि शिंगणापुर मंदिर का इतिहास:
यह एक “जागृत देवस्थान” है जहाँ मूर्ति “स्वयंभू” है।
प्रचलित कथा के अनुसार एक बार भारी वर्षा के बाद पनासनाला (या पनासलना) नदी के तट पर एक विशाल शिला बहकर आ गई। एक किसान ने उसे तोड़ने के लिए जैसे ही उसमें कोई नुकीली वस्तु मारी उस पत्थर में से खून बहने लगा।
उसी रात एक व्यक्ति को स्वप्न आया जिसमें स्वयं शनि देव ने उसे बताया कि वह उसी शिला में विराजमान हैं और गांव के पास स्थापित होने की इच्छा रखते हैं।
साथ ही उन्होंने बताया कि “मैं उस स्थान से तभी हिलूंगा जब मुझे उठाने वाले लोग सगे मामा-भांजा होंगे”।
तभी से यह मान्यता है कि इस मंदिर में यदि मामा-भांजा दर्शन करने जाएं तो अधिक लाभ होता है।
इसके बाद पत्थर को उठाकर एक बड़े से मैदान में सूर्य की रोशनी के तले स्थापित किया गया।
प्रतिदिन शनि देव जी की स्थापित इस पाषाण मूरत पर सरसों के तेल से अभिषेक किया जाता है। भक्त अपनी इच्छानुसार यहाँ तेल का चढ़ावा भी देते हैं।
यहाँ ऐसी मान्यता भी है कि जो भी भक्त यहाँ जाए वह केवल सामने ही देखता हुआ जाए। उसे पीछे से कोई भी आवाज लगाए तो मुड़कर देखना नहीं है। शनि देव को माथा टेक कर सीधा-सीधा बाहर आ जाना है, यदि पीछे मुड़कर देखा तो बुरा प्रभाव होता है।
यह मंदिर दुनिया भर में इस बात के लिए प्रसिद्ध है कि शिंगणापुर गांव के किसी भी घर, दुकान या बैंक में दरवाजे या ताले नहीं लगाए जाते।
गांववालों का मानना है कि यहां चोरी नहीं हो सकती क्योंकि शनि देव की दृष्टि से कोई भी अपराध छिप नहीं सकता। कोई यदि चोरी करने की कोशिश करता है, तो शनि देव तुरंत उसे दंड देते हैं
ऐ कहानी


