डॉ. इंदु भूषण बाली
भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जिसकी नींव ही न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्शों पर रखी गई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं और देश ने आज़ादी का अमृत महोत्सव भी मनाया है। परन्तु आज भी यह कहना कठिन है कि प्रत्येक नागरिक को, विशेषकर दिव्यांगजनों और उपेक्षित वर्गों को, न्याय सुलभ हुआ है। हालांकि संविधान ने कतारबद्ध खड़े व्यक्तियों के अंतिम छोर पर खड़े अंतिम व्यक्ति को न्याय देने के लिए बाध्य ही नहीं बल्कि वचनबद्ध है। लेकिन विडम्बना यह है कि न्याय की देहरी पर बैठकर भी अनेक लोग न्याय से वंचित हैं। यह स्थिति केवल जम्मू और कश्मीर तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के हर कोने में किसी न किसी रूप में न्याय का अभाव दिखाई देता है और उक्त अभाव में न्यायालय के सेवक भी सिसकते दिखाई दे रहे हैं। प्रश्न स्वाभाविक है कि उक्त अभाव के मानवीय प्रभाव से न्यायिक स्वभाव कब परिवर्तित होगा?
क्योंकि न्याय केवल न्यायालयों में निर्णय दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जीवनमूल्य है जो हर नागरिक को आत्मसम्मान और गरिमामय सुरक्षा का भरोसा ही नहीं बल्कि वचन देता है। जब किसी कर्मचारी को केवल दिव्यांगता के कारण सेवा से बाहर किया जाता है, जब भ्रष्टाचार या भ्रांतियों के कारण निर्दोष व्यक्ति पर झूठे आरोप लगाए जाते हैं, जब पीड़ित व्यक्ति को वर्षों तक न्यायालय की सीढ़ियाँ चढ़नी और उतरनी पड़ती हैं और अंततः उसे निराशा मिलती है—तो यह प्रमाण है कि न्याय अभी सब तक नहीं पहुँचा है। अर्थात भारतीय सरकारें अंतरराष्ट्रीय संधियों के लाभ लेने के उपरान्त भी संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित विकलांगता अधिनियम 1995 और संशोधित दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 का लाभ सेवा पर हुए दिव्यॉंग कर्मचारियों को उपलब्ध नहीं करवा सके हैं। उल्लेखनीय है कि माननीय उच्चतम न्यायालय के उदहारणनीय निर्णयों का भी उल्लॅंघन ही नहीं बल्कि डंके की चोट पर अपमान किया जा रहा है। उक्त दिव्यांग कर्मचारियों पर आर्थिक दण्ड लगाया जा रहा है।
मैं स्वयं इसका जीवंत उदाहरण हूँ। सेवा काल में उत्पीड़न, झूठे आरोप, दिव्यांगता कानून की अवहेलना और न्यायालयों में लंबी लड़ाई—यह सब झेलकर मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है कि संविधान में प्रदत्त अधिकार केवल कागजों में नहीं रहने चाहिए, उन्हें यथार्थ की भूमि पर उतरना ही होगा। इसी उद्देश्य से मैंने न केवल संविधान का गहन अध्ययन किया है, बल्कि उसकी व्याख्या और न्यायालयीन प्रयोग को भी समझने का प्रयास किया है। मैंने अनुभव किया है कि न्यायालय की सीढ़ियां चढ़ते ही मुख्य द्वार पर खड़े सुरक्षाकर्मी अन्याय का प्रथम बिगुल बजा देते हैं।
वास्तव में संविधान मात्र विधि का ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह जीवन का मार्गदर्शक है। इसमें वर्णित प्रत्येक अनुच्छेद एक दीपक है जो न्याय की राह को आलोकित करता है। किंतु इन दीपकों को प्रज्वलित करने के लिए हमें ज्ञान, विज्ञान और प्रज्ञान तीनों की आवश्यकता है। ज्ञान हमें अधिकारों की जानकारी देता है, विज्ञान हमें तर्क और प्रमाण जुटाने की क्षमता प्रदान करता है, और प्रज्ञान हमें यह सिखाता है कि इन्हें किस प्रकार मानवता की सेवा में प्रयोग किया जाए।
प्रेस कोर कॉउन्सिल का लक्ष्य इन्हीं कोमल भावनाओं से प्रेरित है—कि भारत के किसी भी कोने में कोई भी मानव न्याय से वंचित न रह सके। चाहे वह आर्थिक अशक्त अथवा सशक्त अर्थात गरीब हो या अमीर, ग्रामीण हो या शहरी, दिव्यांग हो या सामान्य—हर नागरिक को न्याय उसकी चौखट पर सुलभ होना चाहिए। यह लक्ष्य तभी संभव है जब समाज और संस्थाएँ मिलकर जागरूकता बढ़ाएँ। न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या कम करने की नीति बनाएं। त्वरित सुनवाई की व्यवस्था सुनिश्चित करें और न्यायाधीशों को संवेदनशील बनाने की दिशा में ठोस प्रयास किए जाएं।
इस दिशा में मेरी व्यक्तिगत साधना निरन्तर जारी है। चौबीस घंटे मैं संविधान के अनुच्छेदों को समझने और उन्हें वास्तविक जीवन में लागू करने के प्रयास में लगा रहता हूँ। न्यायालय में निजी और जनहित याचिकाओं के माध्यम से जो अनुभव मुझे प्राप्त हुआ है, वह केवल व्यक्तिगत संघर्ष की गाथा नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य पीड़ितों की चीख है जिनकी पुकार अब तक धन के अभाव में दबा दी गई है।
मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि जिन देशभक्त कर्मचारियों की ऑंखों के ऑंसुओं को किसी भ्रष्ट अधिवक्ता तथा किसी अमानवीय न्यायाधीश ने घूस की चमक में गंगा, जमुना और सरस्वती का संगम बना दिया था अब वह ऑंसू नहीं बहेंगे और न ही पीड़ित पीड़ा को सहेंगे। यह हमारा लक्ष्य और मौलिक कर्तव्य भी है जिसे हर हाल में पूरा किया जाएगा। क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 21 की आत्मा है और अनुच्छेद 51ए के अन्तर्गत स्वर्ण सिंह समिति एवं वर्मा कमेटी ने इसे पूर्ण करने की अनुशंसा भी की हुई है।
मेरा विश्वास है कि जब तक प्रत्येक भारतीय अपने मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं होगा, तब तक न्याय की पूर्ण स्थापना असंभव है। न्यायालय अंतिम आश्रय है, परंतु समाज को ही सबसे पहले न्यायप्रिय बनना होगा। यही प्रेस कोर कॉउन्सिल का ध्येय है—न्याय को केवल निर्णय की प्रक्रिया न मानकर उसे जीवन का अनिवार्य अंग बनाना।
यदि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें निष्ठा और परिश्रम से प्रयास करना पड़े, तो यह कोई कठिन कार्य नहीं है। जैसे आजादी के मतवालों ने जीवन का बलिदान देकर स्वतंत्रता दिलाई थी, वैसे ही हमें भी निरन्तर संघर्ष करके यह सुनिश्चित करना होगा कि आने वाली पीढ़ियाँ न्यायपूर्ण भारत में स्वास्थ्यवर्धक साँस ले सकें। सम्माननीयों जय हिन्द
प्रार्थी
डॉ. इंदु भूषण बाली
प्रेस कोर कॉउन्सिल का
राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय सॅंरक्षक,
राष्ट्रपति पद का पूर्व प्रत्याशी, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार, डाकघर एवं तहसील ज्यौड़ियॉं, जिला (जम्मू) जम्मू और कश्मीर पिनकोड 181202
मोबाइल 7889843859
ईमेल आईडी baliindubhushan@gmail.com


