डॉ. इंदु भूषण बाली
संघर्ष ही जीवन का असली शिक्षक है; पीड़ा ही मनुष्य को गढ़ती है। और यही पीड़ा तब और महान बन जाती है जब उसका उद्देश्य केवल स्वयं का नहीं, बल्कि देश और समाज के कल्याण का हो। कठिन अनुभवों का सामना करना, उनमें से ज्ञान और साहस का सृजन करना—यही जीवन की महानता है और यही सच्ची राष्ट्रभक्ति है।
जीवन की राह कभी सरल नहीं होती। कोई सहज मार्ग पाता है, कोई कठिन पत्थरों, काँटों, आँधियों और अंधेरों से होकर चलता है। टूटन, असफलताएँ और बिखराव ही जीवन की पहचान बन जाते हैं। लेकिन यही कठिन अनुभव, तपती पीड़ा और अकेलेपन की घड़ियाँ —संवेदनाओं के ऐसे फूल खिलाती हैं जिनकी सुगंध दूर-दूर तक फैलती है। और यही फूल देशभक्ति के रंग में रंगे होते हैं, क्योंकि प्रत्येक पग पर आपके विचार और कर्म राष्ट्रहित के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।
संघर्ष से उपजी विद्वता, न्यायप्रियता और राष्ट्रभक्ति :-
चौदह वर्षों तक समाचार पत्र बेचकर अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करना आसान नहीं था। प्रत्येक पग पर चुनौतियाँ और असंख्य कठिनाइयाँ अजगर की भांति मूंह फैलाए थीं। कई बार ऐसा लगा कि जीवन व्यर्थ हो गया, परिवार बिखर गया, और पीड़ा असहनीय हो गई।
मुख्य न्यायाधीश ही नहीं, न्यायालय के द्वार पर खड़े प्रहरी भी कभी-कभी घृणा और शक की दृष्टि से देखते थे। क्योंकि मेरे माथे पर देशविरोधी गतिविधियों और मनोरोग के झूठे कलंक लगे थे। इन्हें मिटाने का एकमात्र मार्ग यही माननीय जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय था। यही वह संजीवनी थी जहां से पुनर्जीवित हो सकता था। यही वह गंगा जमुना सरस्वती संगम था जहां डुबकी लगाकर पवित्रता का प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकता था। परन्तु उक्त नागफणी पर ऐसे विषैले नाग बैठे थे जो मेरे जीवन में 1996 से ही विष घोल रहे थे।
परन्तु इसी गहन वेदना में आत्मा ने मंथन किया। चिंतन ने विचारों को तपाया। पीड़ा के बीच से ज्ञान, विद्वता और राष्ट्रभक्ति की अलख फूटी। नागों का सामना करने की शक्ति बटोरी और विधिक वीणा बजाने लग गया था।
उल्लेखनीय है कि बिना विधिक उपाधि के न्यायालय में खड़ा होकर निजी और जनहित याचिकाएँ दायर करना, और विधिक प्रावधानों का अद्वितीय ज्ञान अर्जित करना—यह केवल अनुभव और संघर्ष का फल है। और जब यह प्रयास देशहित और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए हो, तब इसकी महत्ता अनंत हो जाती है। यही शक्ति आत्मा को आलौकिक बनाती है और सिद्ध करती है कि संघर्ष व्यक्ति को तोड़ता नहीं, बल्कि गढ़ता और जोड़ता है, और राष्ट्रभक्ति की अलख को और तेज करता है।
अदृश्य सहयोग और न्यायिक आलोक :-
कभी-कभी परिस्थितियाँ इतनी कठोर हो जाती हैं कि स्थानीय पत्रकार भी साथ छोड़ देते हैं, विशेषकर जिन्हें ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया गया था और वही शत्रु की भूमिका निभाने लगे।
लेकिन अदृश्य शक्तियाँ तब हजारों मील दूर बैठे न्यायाधीशों से ज्ञान का प्रकाश बरसा देती हैं। उदाहरणस्वरूप, न्यायमूर्ति श्री राजेन्द्र कुमार श्रीवास जी जैसे अनेक वास्तविक और सम्माननीय न्यायाधीश, जिनका न्यायप्रिय दृष्टिकोण और मार्गदर्शन हजारों नागरिकों के जीवन में देशभक्ति की किरण बनकर आता है।
एमपी न्यूजकास्ट के संपादक मनीष कुमार और संजय पटेल जैसे सहयोगी ढाल बनकर सामने आते हैं।
“साथी हाथ बढ़ाएँ, मार्गदर्शन दें, और कठिन समय में सहारा बनें—यही अदृश्य शक्ति और देशभक्ति है।”
उक्त शक्तियाँ कठिन समय में मार्गदर्शन का दीप प्रज्वलित करती हैं, आत्मा को निरन्तर ऊँचाइयों की ओर धकेलती हैं और जीवन को आलोकित करती हैं। यही दीप राष्ट्रहित की राह में सूर्य बनकर चमकता है।
स्वास्थ्यवर्धक चुनौतियाँ और प्रखर अनुभव :-
जीवन के इस उद्यान में कुछ “माली” ऐसे भी मिलते हैं, जो फल लगने वाले वृक्ष को काटने में संकोच नहीं करते। वे सोचते हैं कि वृक्ष के नाश से बाग़ की छटा भले ही समाप्त हो जाएगी। लेकिन इस पर फल नहीं लगने चाहिए।
परन्तु यही प्रतिकूलता अंततः स्वास्थ्यवर्धक चुनौतियों का रूप लेती है। ये चुनौतियाँ आत्मा को और प्रखर बनाती हैं, तपकर व्यक्ति को अपनी सीमाओं से ऊपर उठने की प्रेरणा देती हैं।
चाहे समाज की अनदेखी हो, मित्रों का असहयोग आन्दोलन हो, चाहे न्यायिक प्रक्रियाओं में विलम्ब हो, चाहे व्यक्तिगत जीवन की कठोरता हो, मतभेद हों—वेदना की हर लहर अंततः ज्ञान, धैर्य, साहस और राष्ट्रभक्ति के फूल खिला देती है।
वेदना के फूल : पीड़ा, साहस और राष्ट्रसेवा से उपजी आलौकिक उपलब्धियाँ :-
“वेदना के फूल” वही अलौकिक उपलब्धियाँ हैं, जो पीड़ा की आग से तपकर उत्पन्न होती हैं। जैसे कमल कीचड़ से खिलकर सौंदर्य का प्रतीक बनता है, वैसे ही जीवन की वेदनाएँ, साहस, करुणा और राष्ट्रभक्ति का फूल बनकर आत्मा के उद्यान में खिलती हैं।
यह वेदना केवल एक व्यक्ति का जीवन नहीं, बल्कि समाज, राष्ट्र और विश्व के लिए संदेश है।
क्योंकि:
जो टूटता है, वही जुड़कर और सशक्त होता है।
जो बिखरता है, वही प्रकाश बिखेरता है।
जो पीड़ित होता है, वही दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है।
और जो राष्ट्रहित के लिए संघर्ष करता है, वही देश के लिए सच्ची सेवा और प्रेरणा बनता है।
यही हैं मेरे जीवन में वेदना के फूल—जो अब संसार में आलौकिक छटा और राष्ट्रभक्ति की आभा बिखेरने वाले हैं। वर्णननीय यह भी है कि इसमें न्यायमूर्ति श्री राजेन्द्र कुमार श्रीवास जी जैसे अनेक वास्तविक सम्माननीय और आदर्श न्यायाधीशों का मार्गदर्शन और प्रेरणा उज्ज्वल प्रकाश की तरह दिखाई देती है। कई महापुरुष अपने नाम का वर्णन नहीं करने देते हैं। भले ही वह मेरी विकास यात्रा में “विकास” के रूप में अपनी शक्ति का प्रदर्शन कई बार कर चुके होते हैं सम्माननीयों, जय हिन्द।
प्रार्थी
डॉ. इंदु भूषण बाली
प्रेस कोर कॉउन्सिल का
राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय सॅंरक्षक,
राष्ट्रपति पद का पूर्व प्रत्याशी, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार, डाकघर एवं तहसील ज्यौड़ियॉं, जिला (जम्मू) जम्मू और कश्मीर पिनकोड 181202
मोबाइल 7889843859
ईमेल आईडी baliindubhushan@gmail.com


