डॉ. इंदु भूषण बाली
हम भारत के लोग… यह वह मूल्यवान शब्द हैं जिनसे संविधान रचयिताओं ने संविधान को लिखना आरम्भ किया था। यही शब्द हमारे लोकतंत्र की आत्मा माने जाते हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि वही “हम भारत के लोग” आज सबसे बड़े प्रश्न के घेरे में खड़े हैं कि जब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी ने “हम भारत के लोगों” को समान अधिकारों से सम्पन्न किया है, तो फिर भी सम्मान से वंचित क्यों हैं? स्वतन्त्रता के अमृत महोत्सव मना चुके ‘हम भारत के लोग’ विद्वान (LEARNED) और माननीय (HONOURABLE) क्यों नहीं हैं? उक्त शब्द
अधिवक्ताओं, न्यायाधीशों, उपराज्यपालों, राज्यपालों, विधायकों, सांसदों, मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे पदों के लिए क्यों बोले जाते हैं?
वर्णननीय है कि संविधान ने हमें समानता का अधिकार दिया, शिक्षा का अधिकार दिया, जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार दिया, और यहां तक कि न्यायालय के द्वार खटखटाने की स्वतंत्रता भी दी। लेकिन जब वही नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय में जाता है, तो वह केवल स्वयाचिकाकर्ता अर्थात PETITIONER IN PERSON कहलाता है और उसके सामने खड़ा प्रतिवादी अधिवक्ता विद्वान अधिवक्ता अर्थात LEARNED ADVOCATE दर्शाया जाता है। यह कैसा न्याय है? यह कैसा संतुलन है? यह कैसी समानता है? मानो तुला के एक पलड़े में तलवार से लैस योद्धा और दूसरे पलड़े में नंगे हाथों खड़ा नागरिक हो। ऐसे में न्याय तक पहुंच कैसे सम्भव है?
क्या संविधान ने कहीं लिखा कि विद्वता केवल डिग्री पर निर्भर है? क्या जीवनभर का संघर्ष, अनुभव, लेखन और बलिदान “विद्वता की कसौटी” पर शून्य है? चिंतन करिए कि, वही नागरिक जिसे हर पाँच साल में “माननीय” सांसद और विधायक चुनने का अधिकार है, वही नागरिक माननीय न्यायालय में जाकर केवल “याचिकाकर्ता” बन जाता है। यह कैसा लोकतांत्रिक व्यंग्य है कि वोट देकर राजा बनाना आसान है, लेकिन न्याय मांगना अपमान का सबब बन जाता है?
हमारे बलिदानियों ने संविधान के लिए प्राण दिए, सैनिक हर सीमा पर बलिदान दे रहे हैं, किसान खेत में पसीना बहा रहा है, मज़दूर कारख़ानें में दिन-रात परिश्रम कर रहा है—लेकिन जब सम्मान की बारी आती है तो सब पंक्ति से बाहर कर दिए जाते हैं। मानो संविधान उनके लिए अधिकारों का एक शो-पीस हो, जिसे देखा तो जा सकता है पर जिया नहीं जा सकता।
न्यायपालिका कहती है कि समानता सबके लिए है, विधि की दृष्टि में सब समान हैं। परन्तु व्यवहार में “हम भारत के लोग” और विद्वान अधिवक्ता अर्थात LEARNED ADVOCATES के बीच की दूरी बढ़ती जाती है। प्रश्न यह नहीं है कि वकीलों को सम्मान क्यों दिया जाता है; सवाल यह है कि नागरिक को वही सम्मान क्यों नहीं दिया जाता? क्या किसी नागरिक का दशकों का संघर्ष, पुस्तक लेखन, विश्व कीर्तिमान, सामाजिक आंदोलन, अथक याचिकाएं, मात्र इसलिए अर्थहीन हैं क्योंकि उसके पास वकालत की डिग्री नहीं है?
यह व्यंग्य भी है और त्रासदी भी कि लोकतंत्र में सत्ता का स्रोत नागरिक माने जाते हैं, लेकिन वही नागरिक न्यायालय में “माननीय” नहीं बल्कि “साधारण” कहलाते हैं। यह स्थिति केवल कानून की भाषा की गलती नहीं है, यह मानसिकता की कमी भी है जबकि इन्हीं नागरिकों से कर अर्थात टेक्स बसूल कर डिप्टी सालिसीटर जनरल ऑफ इन्डिया अथवा न्यायाधीशों को वेतन दिया जाता है। प्रश्न यह भी है कि संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के संरक्षण का दायित्व उठाने वाली माननीय न्यायालय में ही उक्त उक्त समानता के अधिकार में असमानता का नंगा नाच क्यों?
आज आवश्यकता है कि हम इस असमानता को पहचानें। क्योंकि जब तक “हम भारत के लोग” केवल शब्दों में विद्यमान रहेंगे और सम्मान के वास्तविक पद से वंचित रहेंगे, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा। परम आवश्यकता यह भी है कि सम्पूर्ण भारत के लोग मौलिक कर्तव्यों पर चिंतन एवं मंथन करें और अपने मौलिक अधिकारों को प्राप्त करें।
अतः अन्ततः सकारात्मक संदेश यही है कि समाज और न्यायपालिका दोनों को मिलकर यह स्वीकार करना होगा कि विद्वता केवल डिग्रीधारकों का मोहताज नहीं होती। अनुभव, संघर्ष और नैतिकता भी विद्वता का स्तम्भ हैं। जब माननीय न्यायालय नागरिक को भी विद्वान स्वयाचिकाकर्ता अर्थात LEARNED PETITIONER IN PERSON कहेगी, तभी सच्चे अर्थों में समानता स्थापित होगी।
तब जाकर संविधान की आत्मा यह कह पाएगी कि
“हम भारत के लोग” केवल अधिकारों से सम्पन्न ही नहीं, बल्कि मान-सम्मान से भी परिपूर्ण हैं।
प्रार्थी
डॉ. इंदु भूषण बाली
प्रेस कोर कॉउन्सिल का
राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय सॅंरक्षक,
राष्ट्रपति पद का पूर्व प्रत्याशी, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार, डाकघर एवं तहसील ज्यौड़ियॉं, जिला (जम्मू) जम्मू और कश्मीर पिनकोड 181202
मोबाइल 7889843859
ईमेल आईडी baliindubhushan@gmail.com


