डॉ. इंदु भूषण बाली
भारत का संविधान केवल अधिकारों का ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह कर्तव्यों की भी पावन गीता है। मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और उपयोग तभी सार्थक हो सकती है जब प्रत्येक नागरिक अपने मौलिक कर्तव्यों का पालन निष्ठापूर्वक करे। आज आवश्यकता इस बात की है कि हर आँगन, हर घर और हर संस्था में कर्तव्यों का दीप प्रज्वलित किया जाए ताकि राष्ट्र सशक्त, एकजुट और आत्मनिर्भर बन सके।
उल्लेखनीय है कि 1976 में स्वर्ण सिंह समिति ने संविधान में कर्तव्यों को शामिल करने की सिफारिश की थी। समिति का सुझाव था कि नागरिकों को उनके कर्तव्यों की जानकारी शैक्षणिक संस्थानों और सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से दी जाए, ताकि वे अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का पालन भी निष्ठापूर्वक करें।
बाद में 1999 में जस्टिस वर्मा समिति ने यह स्पष्ट किया कि मौलिक कर्तव्यों का पालन केवल नैतिक आग्रह नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे व्यवहारिक, सतत और सार्वभौमिक बनाया जाना चाहिए। समिति ने यह सुझाव दिया कि सरकार, विधिक सेवा प्राधिकरण और नागरिक समाज मिलकर जागरूकता अभियानों के माध्यम से घर-घर तक यह संदेश पहुंचाएं क्योंकि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य पालन, दूसरों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
प्रेस कोर काउन्सिल के राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय संरक्षक इंदु भूषण बाली ने यह अपील की है कि मौलिक कर्तव्यों का प्रचार-प्रसार केवल पुस्तकों, कक्षाओं अथवा न्यायालयों तक सीमित न रहकर आम नागरिकों के जीवन का हिस्सा बने। उन्होंने कहा कि जैसे सरकार ने “घर-घर तिरंगा” अभियान चलाया, वैसे ही संविधान के अनुच्छेद 51(A) में उल्लिखित कर्तव्यों की ज्योति हर आँगन तक पहुँचाई जाए।
आज हम देखते हैं कि समाज में कई समस्याएं जैसे भ्रष्टाचार, असमानता, प्रदूषण, अमानवता, राष्ट्र-विरोधी गतिविधियाँ—इसी कारण बढ़ती हैं क्योंकि लोग अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक नागरिक एवं न्यायिक अधिकारी यह संकल्प ले कि वह ईमानदारी, भाईचारा, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्रप्रेम, अनुशासन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जैसे कर्तव्यों का पालन करेंगे, तो अनेक सामाजिक और राष्ट्रीय समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी।
सरकार का प्रथम दायित्व केवल योजनाएं बनाना नहीं है, बल्कि नागरिकों को कर्तव्यों की ओर जागरूक करना भी है। उन्होंने सुझाव दिया कि जैसे स्कूलों में शिक्षा दी जाती है, वैसे ही “कर्तव्य-शिक्षा” का अभियान अनिवार्य होना चाहिए। हर न्यायालय, पंचायत, नगर निकाय और सरकारी व गैर-सरकारी संस्था को यह जिम्मेदारी दी जानी चाहिए कि वे समय-समय पर मौलिक कर्तव्यों पर कार्यक्रम आयोजित करें।
उन्होंने यह भी कहा कि कॉरपोरेट जगत अपने लाभ का 2% “कर्तव्य प्रोत्साहन ट्रस्टों” को दें, जिससे यह मिशन घर-घर पहुंचे। इससे समाज में सकारात्मक सोच, नैतिकता और राष्ट्र के प्रति निष्ठा विकसित होगी।
इसलिए उक्त अभियान में केवल सरकार और नागरिक ही नहीं, बल्कि भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री बी आर गवई जी एवं संविधान संरक्षक माननीय महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी का भी दायित्व है कि वे मौलिक कर्तव्यों की सुरक्षा और प्रचार के लिए नीतिगत दिशा-निर्देश और संवैधानिक निगरानी सुनिश्चित करें।
यदि सरकार, न्यायपालिका, नागरिक समाज और कॉरपोरेट जगत मिलकर इस दिशा में कदम बढ़ाएं, तो आने वाली पीढ़ियां न केवल अधिकारों का लाभ उठाएंगी, बल्कि अपने कर्तव्यों का पालन करके भारत को विश्वगुरु बनाने में योगदान देंगी। मौलिक कर्तव्यों का दीप जब हर आँगन में प्रज्वलित होगा, तब सच्चे अर्थों में स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रक्षा सम्भव होगी।
उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यह अपील केवल एक विचार नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा की पुकार है। समय की माँग है कि इस पुकार को प्रत्येक नागरिक सुने, समझे और अपने जीवन का मार्गदर्शन बनाए। क्योंकि मौलिक कर्तव्य ही मौलिक अधिकारों का आधार हैं।
सम्माननीयों, जय हिन्द।
प्रार्थी
डॉ. इंदु भूषण बाली
प्रेस कोर कॉउन्सिल का राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय संरक्षक,
राष्ट्रपति पद का पूर्व प्रत्याशी, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डाकघर एवं तहसील ज्यौड़ियॉं, जिला (जम्मू) जम्मू और कश्मीर, पिनकोड 181202
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