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Home Uncategorized

पीएच.डी.: उपाधि का बोझ या चरित्र की पहचान?

by Manish Gautam Chiefeditor
September 6, 2025
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पीएच.डी.: उपाधि का बोझ या चरित्र की पहचान?
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✍️ डॉ. इंदु भूषण बाली

पीएच.डी. की उपाधि! सुनने में कितना गौरवपूर्ण शब्द है, मानो विद्वता की पराकाष्ठा यहीं आकर ठहर जाती हो। परन्तु क्या सचमुच ऐसा है? क्या डिग्री मिलते ही अर्थात प्राप्त करते ही व्यक्ति विद्वान हो जाता है और राष्ट्रहित में उसका ज्ञान नैतिकता का प्रकाश फैलाता है? यह प्रश्न आज हर सोचने वाले नागरिक को मथ रहा है, चिंतन कर रहा है कि ऐसी डिग्रियों का क्या अचार डालना है जो राष्ट्रनिर्माण में सहयोगी न हों?

उल्लेखनीय हैं कि डिग्रियों के अंबार लगाने वाले हमारे विश्वविद्यालय आज ज्ञान के मंदिर कम और प्रमाणपत्र बाँटने की दुकानों की तरह अधिक दिखाई देते हैं। शोध के अर्थ ही अर्थहीन हो चुके हैं और यदि कहीं किसी शोध के अर्थ हैं भी तो उक्त शोधार्थी के वर्षों तक खून-पसीना बहाकर लिखे गए थीसिस प्रोफेसर की अलमारी में धूल चाटते रह जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि “दिए तले अंधेरा” जैसी लोकोक्ति चरितार्थ हो जाती है। अर्थात ज्ञान का दीपक तो जल रहा है, पर उसका प्रकाश राष्ट्र और समाज तक नहीं पहुँच पा रहा है। वर्णननीय यह भी है कि उक्त प्रोफेसरों की भॉंति पीच.डी डिग्री धारक अधिवक्ताओं में भी विधिक साक्षरता लुप्त होती दिखाई दे रही है। इसलिए शोध इस बिंदु पर भी होना चाहिए है कि पीएच.डी डिग्री धारकों ने राष्ट्रनिर्माण में क्या-क्या योगदान दिया?

वर्णननीय यह भी है कि अधिकांश प्रोफेसर अपनी सेवानिवृत्ति के बाद जॉबलेस हो जाते हैं भले ही उन्हें सरकार जीवनयापन के लिए पेंशन देती है। परन्तु उनके पास करने को कोई काम नहीं रहता और वह निठल्ले की उपाधि से बचने के लिए कवि मंचों पर अपनी विद्वता का प्रदर्शन करते दिखाई देते हैं और ग्रामीण कवियों को मिलने वाला मानदेय ₹1350/- को छीन लेते हैं। तथाकथित विद्वान प्रोफेसरों का जमावड़ा कोई भी जम्मू कश्मीर कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी जम्मू में देख सकता है जहां उक्त तथाकथित विद्वान मात्र ₹1350/- का मानदेय लेकर कवि-मंचों पर मंचासीन होते हैं और वह यह अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। ऐसी विद्वता के प्रदर्शन पर तब प्रश्न और भी तीखा हो जाता है कि क्या यही राष्ट्रनिर्माण है? विद्वता अगर केवल आत्मप्रशंसा का साधन रह जाए, तो वह बोझ है, वरदान नहीं।

हम कह सकते हैं कि यह ऊँची दुकान फीका पकवान कहावत को चरितार्थ करते हैं। क्योंकि यह कहावत उन शोध विषयों पर सटीक बैठती है जिनमें समाज या राष्ट्र को कुछ भी नहीं मिलता। “फलां कवि की रचनाओं में प्रकृति का चित्रण” या “फलां लेखक के उपन्यासों में नारी-विमर्श या फलां लेखक के आलेखों में साहित्य और संस्कृति का सत्यानाश” जैसे शोध प्रबंधों से राष्ट्रहित का क्या संबंध? देश भूख, सुरक्षा बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और न्याय संकट से जूझ रहा है, और विद्वता के नाम पर विश्वविद्यालय ‘शब्दों का महल’ खड़ा कर रहे हैं। ऐसे प्रोफेसरों का समाज और राष्ट्र को क्या लाभ है?

अब बात अधिवक्ता पर करें तो जो पीएच.डी. की उपाधि लेकर न्यायालयों में विद्वान कहलाते हैं, यदि वे संवैधानिक राष्ट्रीय सुरक्षा में अपना न्यायिक योगदान नहीं दे सकते, यदि वे केवल लंबी अर्थहीन दलीलें देकर मामलों को टालते हैं, तो उनकी भी डिग्री स्वतंत्र भारत में किस काम की? “नाच न जाने आँगन टेढ़ा” वाली कहावत को चरितार्थ करने वाले कई पीएच.डी डिग्री धारक अधिवक्ताओं का विधि की विद्वता में यही हाल है, जब वह राष्ट्रहित के मामलों में जुड़ने का भी साहस नहीं करते। ऐसे पीएचडी अधिवक्ताओं का भी समाज और राष्ट्र को क्या लाभ है?

सम्मेलन और सेमिनारों की दुनिया भी कम व्यंग्यात्मक नहीं। “ढोल की पोल” वहीं खुलती है, जब मंच पर लंबी-लंबी भाषणबाज़ी होती है, जहां अपने ही चहेतों को पुरस्कृत किया जाता है, प्रमाणपत्र बाँटे जाते हैं, और अगले दिन सब कुछ भुला दिया जाता है। उक्त तालियों की गड़गड़ाहट में जनहित एवं राष्ट्रहित कहीं खो जाता है?

सच तो यह है कि विद्वता का असली मूल्य डिग्रियों या मानदेय में नहीं, बल्कि चरित्र और नैतिकता में है। यदि शिक्षा चरित्रहीन हो, तो वह राष्ट्र के लिए बोझ है। यदि उपाधि समाज की चेतना न जगाए, तो वह केवल आत्ममुग्धता का साधन है।

आज राष्ट्र को ऐसे विद्वानों की आवश्यकता है जिनकी विद्वता केवल पुस्तकों तक सीमित न होकर समाज के जीवन में उतर सके। “हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फ़ारसी क्या”—विद्वता वही है जो बिना दिखावे के जनमानस को दिशा दे।

अतः समय आ गया है कि हम आत्ममंथन करें—

क्या हम विद्वान हैं, या केवल उपाधियों के संग्रहकर्ता?

क्या हमारी शिक्षा राष्ट्र को आलोकित करती है, या केवल व्यक्तिगत लाभ का साधन है?

क्या पीएच.डी. चरित्र की कसौटी है, या मात्र बोझिल उपाधि?

निष्कर्ष यही है:
शिक्षा का उद्देश्य राष्ट्रहित में नैतिकता का प्रकाश फैलाना है। यदि वह समाज या राष्ट्र को दिशा नहीं देती, तो चाहे वह प्रोफ़ेसर की डिग्री हो या अधिवक्ता की—वह केवल “घर की मुर्गी दाल बराबर” बनकर रह जाती है। सम्माननीयों जय हिन्द

प्रार्थी
डॉ. इंदु भूषण बाली
प्रेस कोर कॉउन्सिल का
राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय सॅंरक्षक,
राष्ट्रपति पद का पूर्व प्रत्याशी, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार, डाकघर एवं तहसील ज्यौड़ियॉं, जिला (जम्मू) जम्मू और कश्मीर पिनकोड 181202
मोबाइल 7889843859
ईमेल आईडी baliindubhushan@gmail.com

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