भारत ने स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाया है। संविधान के अनुच्छेद 14 ने समानता का वचन दिया और अनुच्छेद 21 ने प्रत्येक नागरिक को गरिमामय जीवन की प्रतिज्ञा दी। फिर भी आज स्थिति यह है कि सेवक कहे जाने वाले विधायक–सांसद ऐश्वर्य में जीते हैं और स्वामी अर्थात नागरिक गरीबी, असमानता और अभाव रूपी चुनौतियों में जीने को विवश हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य—ये दो मूलभूत अधिकार—आज सबसे बड़े भेदभाव का आधार बन चुके हैं।
शिक्षा : वचन और वास्तविकता
संविधान का छियासीवाँ संशोधन, 2002 (86th Amendment Act, 2002) द्वारा अनुच्छेद 21-ए जोड़ा गया, जिसमें कहा गया कि छह से चौदह वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा मिलेगी। इसके लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम, 2009 (Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009) लागू किया गया। जम्मू और कश्मीर में प्रभावी विद्यालय शिक्षा अधिनियम, 2002 (School Education Act, 2002) की धारा 20ई(1) भी यही प्रावधान करती है कि सरकार बच्चों की शिक्षा हेतु व्यवस्था सुनिश्चित करेगी।
इसके उपरान्त भी वास्तविकता यह है कि देश के बच्चे दो भागों में बंटे हैं :-
एक ओर सरकारी विद्यालय, जहाँ न्यूनतम सुविधाएँ, शिक्षकों की कमी और अव्यवस्था।
दूसरी ओर निजी विद्यालय, जहाँ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध है, परन्तु उसका शुल्क गरीब और मध्यवर्गीय परिवारों की पहुँच से बाहर है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यूनिकृष्णन जे.पी. बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1993) में शिक्षा को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना। टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन (2002) और सोसायटी फॉर अनएडेड प्राइवेट स्कूल्स बनाम भारत संघ (2012) में शिक्षा में समान अवसर की अनिवार्यता स्पष्ट की गई। किंतु व्यवहार में शिक्षा आज भी विशेषाधिकार का माध्यम बन गई है स्पष्ट कहें तो व्यापार बन गई है।
स्वास्थ्य : अधिकार या व्यापार?
अनुच्छेद 21 की व्याख्या करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार कहा है कि स्वास्थ्य जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है।
कंज्यूमर एजुकेशन एण्ड रिसर्च सेंटर बनाम भारत संघ (1995) में कहा गया कि स्वस्थ रहना गरिमामय जीवन के लिए अनिवार्य है।
पश्चिम बंग कृषक मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1996) में राज्य पर बाध्यता डाली गई कि वह प्रत्येक नागरिक को तत्काल और उचित स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराए।
किन्तु वर्तमान व्यवस्था में दोहरी स्थिति बनी हुई है।
(क) सरकारी चिकित्सालय, जहाँ भीड़, गंदगी और साधनों का अभाव।
(ख) निजी चिकित्सालय, जहाँ उच्च स्तरीय उपचार तो उपलब्ध है परन्तु अत्यधिक महँगा। साधारण नागरिक के लिए लोमड़ी की भांति अंगूर खट्टे हैं।
इस प्रकार नागरिक जन्म से ही भेदभाव का शिकार होते हैं :-
जैसे कोई शिशु सरकारी अस्पताल की दुर्गन्ध और कोई निजी अस्पताल की सुवास अर्थात सुगन्ध में जन्म लेता है। यही असमानता उसके पूरे जीवन की दिशा तय कर देती है। ऐसे में यक्ष प्रश्न स्वाभाविक है कि संविधान द्वारा वचन देने के उपरान्त भी शिशुओं के जन्म पर ही उनसे भेदभाव, तिरस्कार और गरिमा का अपमान क्यों?
न्यायपालिका की चुप्पी : सबसे बड़ा प्रश्न
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ही अनेक निर्णयों में शिक्षा और स्वास्थ्य को जीवन के मौलिक अधिकारों का भाग माना है। उसके बावजूद न्यायपालिका आज इस असमान व्यवस्था पर मौन क्यों है? यदि न्यायपालिका अपने संवैधानिक और नैतिक कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करे तो उसे सरकार को यह आदेश देना चाहिए कि—
या तो सभी निजी संस्थानों को सार्वजनिक ढाँचे (Public Framework) में लाया जाए,
अथवा सभी सरकारी संस्थानों को निजी संस्थानों के समकक्ष गुणवत्तापूर्ण बनाया जाए।
समानता तभी साकार होगी जब शिक्षा और स्वास्थ्य नागरिक का अधिकार हों, व्यवसाय अथवा व्यापार कदापि (Commodity) नहीं।
निष्कर्ष
भारत का लोकतंत्र तब तक अधूरा है जब तक नागरिकों को समान शिक्षा और समान स्वास्थ्य की प्रतिज्ञा व्यवहार में प्राप्त नहीं होती। संविधान का वचन केवल कागज़ों में नहीं, जीवन में उतरे।
जब सेवक वैभव में और स्वामी अभाव में हों, तब यह प्रश्न उठना ही चाहिए — क्या संवैधानिक समानता और गरिमा की प्रतिज्ञा लुप्त हो गई है? इसका विधिक उत्तर न्यायपालिका को देना ही होगा। सम्माननीयों जय हिन्द
प्रार्थी
डॉ. इंदु भूषण बाली
प्रेस कोर कॉउन्सिल का
राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय सॅंरक्षक,
राष्ट्रपति पद का पूर्व प्रत्याशी, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार, डाकघर एवं तहसील ज्यौड़ियॉं, जिला (जम्मू) जम्मू और कश्मीर पिनकोड 181202
मोबाइल 7889843859
ईमेल आईडी baliindubhushan@gmail.com


