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मौलिक कर्तव्यों की पूर्ति के पथ पर तीव्र गति से अग्रसर “प्रेस कोर काउन्सिल” और स्वार्थ के घोड़ों पर सवार कतिपय संस्थापक सदस्यों के दुर्भावनापूर्ण चाबुक के अथक प्रयास

by Manish Gautam Chiefeditor
September 2, 2025
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मौलिक कर्तव्यों की पूर्ति के पथ पर तीव्र गति से अग्रसर “प्रेस कोर काउन्सिल” और स्वार्थ के घोड़ों पर सवार कतिपय संस्थापक सदस्यों के दुर्भावनापूर्ण चाबुक के अथक प्रयास
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डॉ. इंदु भूषण बाली

भारत के लोकतंत्र की सुदृढ़ता मात्र मौलिक अधिकारों के संरक्षण में नहीं, बल्कि संविधान में संशोधित अनुच्छेद 51ए के अन्तर्गत मौलिक कर्तव्यों के पालन में भी निहित है। जब कोई संस्था अपने उद्देश्य को कर्तव्यबोध एवं कर्तव्यनिष्ठा और नैतिक आस्था के साथ आगे बढ़ाती है, तब वह राष्ट्र निर्माण की सच्ची भागीदार बनती है। “प्रेस कोर काउन्सिल” आज इसी भूमिका को आत्मसात करते हुए तीव्र गति से आगे बढ़ रही है। यह परिषद पत्रकारिता की मूल स्वतंत्रता को केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व मानती है।

किन्तु इतिहास बताता है कि जब भी कोई संगठन या आंदोलन प्रगति करता है, तो कुलद्रोही विभीषण एवं अंहकारी दुर्योधन रूपी चुनौतियॉं बाहर से कम और भीतर से अधिक उठ खड़ी होती हैं। कभी-कभी वे ही लोग, जो प्रारम्भ में मार्गदर्शक या संस्थापक सदस्य कहलाते हैं, स्वार्थ के घोड़ों पर सवार होकर संस्था की पीठ पर चाबुक चलाने लगते हैं। उनका प्रयत्न संगठन को रोकने का होता है, लेकिन परिणाम यह होता है कि संगठन और अधिक निष्ठा, आत्मबोध, अनुशासन और नागरिकों के विश्वास के सहारे और भी तीव्र गति से आगे बढ़ता है।

“प्रेस कोर काउन्सिल” की सबसे बड़ी शक्ति इसकी सकारात्मक सोच और कर्तव्यनिष्ठ दृष्टि है। यह संस्था ‘कर्तव्य पहले, अधिकार रूपी स्वार्थ बाद में’ के सिद्धांत पर आगे बढ़ रही है। यही कारण है कि यह परिषद पत्रकारिता को केवल समाचारों तक सीमित नहीं रखती, बल्कि इसे सामाजिक चेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का सशक्त साधन बना रही है जिसके सशक्त घोड़े सम्पूर्ण न्याय, भोजन, वस्त्र, निवास, औषधि, शिक्षा और स्वास्थ्य एवं राष्ट्रहित में जनहित याचिकाओं के रथ को खींच रहे हैं और राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के आधारभूत मुद्दों के प्रति जागरूकता का शंखनाद कर रहे हैं।

उदाहरणार्थ रामायण का प्रेरणास्रोत : श्रीभरत की अडिग प्रतिज्ञा :-

भारतीय संस्कृति में कर्तव्य और निष्ठा के सर्वोच्च उदाहरणों में से एक रामायण में मिलता है। जब भगवान राम वनवास पर गए, तब उनके अनुज भरत ने अयोध्या का शासन स्वीकार करने के बजाय उनकी पादुकाएं सिंहासन पर रखीं। यही नहीं, भरत ने एक ऐसी प्रतिज्ञा की जो आज भी कर्तव्यपरायणता का प्रमुख उदाहरण है।

रामायण साक्षी है कि श्रीभरत जी ने श्रीराम जी से स्पष्ट कहा था कि “चौदह वर्ष का अर्थ मात्र चौदह वर्ष” है। यदि आपने एक दिन भी अधिक लगाया अर्थात आप न लौटे, तो भरत आपको चिता पर जलते हुए मिलेगा।” यह प्रतिज्ञा श्रीराम जी को समय पर लौटने के लिए बाध्य करती है ना कि श्रीभरत जी को चिता पर जलने की। क्योंकि यह वचन केवल भ्रातृ-प्रेम का प्रतीक नहीं था, बल्कि यह अनुशासन, वचनबद्धता और संकल्प का सर्वोच्च सकारात्मक उदाहरण था। लेकिन ध्यान रहे कि उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा में “यदि” का विशेष प्रयोग किया था जिसमें उसके महत्व का सन्देश भी छुपा हुआ है और उस छुपे हुए सन्देश को वर्तमान समय के विद्वान नागरिक आज भी प्रयोग करते हुए दिखाई देते हैं। जिनमें से एक लेखक स्वयं हैं जो यदि का गूढ़ रहस्यमय सन्देश को जानते हैं।

“यदि” का गूढ़ संदेश :-

भरत की प्रतिज्ञा में प्रयुक्त “यदि” शब्द अत्यंत गहन है। यह कोई शंका या अशक्तता अर्थात निर्बलता नहीं, बल्कि मर्यादा की पराकाष्ठा अर्थात अंतिम रेखा थी। जिसका अर्थ था कि “यदि राम समय पर लौटे तो प्रतिज्ञा पूर्ण” और “यदि देर हुई तो भरत प्राण त्याग देंगे। उक्त “यदि” ने प्रतिज्ञा को और भी दृढ़ बना दिया। इससे स्पष्ट हुआ कि जब शर्त का पालन किया जाता है तो प्रतिज्ञा अक्षुण्ण रहती है, किंतु उसके उल्लंघन पर परिणाम भी निश्चित और अपरिवर्तनीय होता है अर्थात किसी भी प्रतिज्ञा में “यदि” का बहुत बड़ा महत्व होता है।

यही शिक्षा हमें भी मिलती है – किसी संस्था या संगठन का संकल्प तभी फलदाई है जब उसके प्रत्येक सदस्य अपने कर्तव्यों की शर्तों का पालन करें। यदि वे निष्ठापूर्वक कार्य करेंगे तो संगठन समाज को प्रकाशमान करेगा। यदि वे स्वार्थ, ईर्ष्या और गुटबाज़ी को स्थान देंगे तो वही संगठन अंधकार में डूब जाएगा और भीष्म पितामह की “यदि रहित” प्रतिज्ञा द्रोपदी का वस्त्रहरण नहीं बल्कि स्वयं के वस्त्रहरण करेंगे, जिसका उत्तरदायित्व भी उनका ही होगा। यह उन्हें सूचना एवं चेतावनी भी है कि वह किसी भी सदस्य को प्रश्न करने से पूर्व स्वयं को भी प्रश्न करें कि उनका “प्रेस कोर कॉउन्सिल” आरम्भ से लेकर अब तक का योगदान क्या क्या हैं?

संगठन का पथ और सदस्य का दायित्व :-

आज “प्रेस कोर काउन्सिल” के सामने भी यही चुनौती है। यह संस्था जनकल्याण और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए कार्यरत है। किंतु इसके प्रत्येक सदस्य को यह समझना होगा कि संगठन व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का मंच नहीं, बल्कि राष्ट्रहित का मंदिर है और उक्त मंदिर में किसी सदस्य द्वारा दी गई पूर्व आहुतियों का वर्णन करना सॅंगठन के हितों को दर्शाता है न कि उसका स्वार्थ।

विशेषकर तब जब माननीय जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय की माननीय खॅंडपीठ के माननीय विद्वान न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री अतुल श्रीधरन जी यह पूछें कि आप सेना मन्त्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देश को लागू करवाने में सॅंविधान द्वारा दिए गए नागरिक मौलिक कर्तव्यों एवं राष्ट्रभक्ति के अपने मौलिक अधिकारों पर बल क्यों दे रहे हैं तो याचिकाकर्ता को बताना आवश्यक हो जाता है कि वह क्यों दस हजार रुपए का हर्जाना लगने के उपरान्त भी अपनी बात सरकार के समक्ष रखने के लिए चिता पर बैठकर जलकर अपने प्राणों की आहुति देने की प्रतिज्ञा के बाध्यकारी है? यह भी बताना आवश्यक हो जाता है कि इसी माननीय उच्च न्यायालय के माननीय विद्वान न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री धीरज सिंह ठाकुर और न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्रीमती सिंधु शर्मा जी उक्त दिशानिर्देशों पर ओडब्ल्यूपी नम्बर 2285/2018 एवं डब्ल्यूपी (सी) 2200/2021 में रोक (स्टे ऑर्डर) के आदेश जारी कर चुके हैं जो वर्तमान में भी माननीय उच्च न्यायालय के विचाराधीन हैं।

इसके अतिरिक्त यह बताना भी परम आवश्यक हो जाता है कि “उपजिला चिकित्सालय ज्यौड़ियॉं” का उक्त नए विवादित भवन में स्थानान्तरण करना सॅंविधान के अनुच्छेद 141 और 144 के अन्तर्गत मात्र माननीय विद्वान न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री धीरज सिंह ठाकुर और न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्रीमती सिंधु शर्मा जी का ही अपमान नहीं है बल्कि माननीय उच्चतम न्यायालय के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री बी आर गवई जी द्वारा लेफ्टिनेंट कर्नल सुप्रिता चन्देल बनाम भारत सॅंघ में पारित बाध्यकारी निर्णयों का भी स्पष्ट अपमान है इसलिए आत्मदाह की सकारात्मक प्रतिज्ञा आवश्यक हो जाती है और तहसीलदार (प्रथम श्रेणी न्यायिक अधिकारी) ज्यौड़ियॉं द्वारा सुनवाई के उपरान्त आत्मदाह वाली प्रतिज्ञा की पूर्ति का कोई महत्व नहीं रहता है बल्कि वह लोग दोषी माने जा सकते हैं जो तहसीलदार ज्यौड़ियॉं डॉ. दीपक भारती जी द्वारा उचित समाधान करने और लिखित रिपोर्ट सार्वजनिक करने के उपरान्त मुझे “आत्मदाह” करने के लिए विवश एवं बाध्य क्यों कर रहे हैं? वर्णननीय है कि डॉ. प्रशासनिक ही नहीं बल्कि न्यायिक प्रतिबिंब हैं जिन्होंने “उपजिला चिकित्सालय ज्यौड़ियॉं” के सम्बन्ध में हमें वचन दिया था कि जो माननीय उच्च न्यायालय का आदेश होगा, वही लागू किया जाएगा। इसलिए उन्होंने अपनी रिपोर्ट में भी मुझे परामर्श दिया हुआ है कि मैं माननीय उच्च न्यायालय में न्यायिक प्रक्रिया को सुचारू रखूं।

उल्लेखनीय है कि त्रुटिपूर्ण पुनर्विचार याचिका अर्थात डिफेक्टिव रिव्यू पिटीशन अंक 906/2025 की आगामी तिथि 25-08-2025 थी जिसमें से त्रुटियां दूर करने का आदेश था लेकिन मैं बीमारी के कारण उन्हें दूर नहीं कर सका था। इसके लिए मैंने 25-08-2025 को सशक्त अधिवक्ता एवं आर्थिक सहायता की मॉंग की थी जिन्हें सुनने के बाद विचार करने का आश्वासन देते हुए खॅंडपीठ के माननीय विद्वान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री अरूण पल्ली जी की अध्यक्षता वाली खॅंडपीठ ने 06-10-2025 तक सुनवाई स्थगित कर दी हुई है। सम्भव है हमें सशक्त अधिवक्ता एवं आर्थिक सहायता दी जाएगी जिसके बल पर हम माननीय उच्चतम न्यायालय में भी “उपजिला चिकित्सालय ज्यौड़ियॉं” के विवादित निर्माणाधीन भवन में स्थानान्तरण को चुनौती देंगे।

अतः अन्ततः संगठन के प्रत्येक संस्थापक सदस्य को “दुर्भावनापूर्ण चाबुक” मारने की श्रेणी से ऊपर उठकर “दीपक की भांति बनना होगा। क्योंकि दीपक यदि भीतर ही भीतर जलने लगे तो घर को अंधकारमय कर सकता है, किंतु वही दीपक यदि उचित दिशा एवं दशा में प्रज्वलित हो, तो वह न केवल घर, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र एवं समाज को दिव्यता प्रदान कर, उसकी चारों दिशाओं को आलोकित कर देता है।

अंतिम संदेश :-

भरत की प्रतिज्ञा की तरह ही हमें भी यह दृढ़ संकल्प लेना होगा कि यदि हम अपने मौलिक कर्तव्यों के मार्ग पर अडिग रहेंगे तो कोई भी स्वार्थी चाबुक हमें विचलित नहीं कर पाएगा। लेकिन यदि हमने शर्तें तोड़ीं और मार्ग से हटे, तो हमारी प्रतिज्ञा भी टूट जाएगी और संगठन का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा।

इसलिए समय की पुकार यही है कि हम सब मिलकर संगठन को व्यक्तिगत टकराव से मुक्त करें और उसे जनहित की ऊर्जा से प्रफुल्लित करें। तभी “प्रेस कोर काउन्सिल” पत्रकारिता की अस्मिता और लोकतंत्र की गरिमा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकेगी।

यही सकारात्मक ऊर्जा का अमर संदेश है कि बाधाएं चाहे घर के चिराग़ से ही क्यों न आएँ, यदि संकल्प पवित्र और निष्ठा अडिग हो तो वही चिराग़ राष्ट्रप्रगति की “प्रज्वलित मशाल” बन जाता है। 🇮🇳 जय हिन्द 🇮🇳

प्रार्थी
डॉ. इंदु भूषण बाली
प्रेस कोर कॉउन्सिल का
राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय सॅंरक्षक,
राष्ट्रपति पद का पूर्व प्रत्याशी, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार, डाकघर एवं तहसील ज्यौड़ियॉं, जिला (जम्मू) जम्मू और कश्मीर पिनकोड 181202
मोबाइल 7889843859
ईमेल आईडी baliindubhushan@gmail.com

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