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Home ज्योतिष

हरतालिका तीज का व्रत.क्या होता है फुलेरा और क्यों है इसका महत्व?

by Manish Gautam Chiefeditor
August 26, 2025
in ज्योतिष
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हरतालिका तीज का व्रत.क्या होता है फुलेरा और क्यों है इसका महत्व?
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फुलेरा, जिसके बिना तीज की पूजा अधूरी मानी जाती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि फुलेरा होता क्या है और आखिर क्यों इसे इतना पवित्र माना गया है?

फुलेरा नाम ही अपने आप में इसके महत्व को दर्शाता है. दरअसल यह फूलों से बनी एक विशेष सजावट है, जिसे पूजा के लिए तैयार किया जाता है. इसे किसी छोटे आसन, मिट्टी के ढांचे या लकड़ी के प्लेटफॉर्म पर सजाया जाता है. इसके ऊपर फूलों, पत्तों और पवित्र धागों से एक सुंदर संरचना बनाई जाती है. यही नहीं, कई जगहों पर महिलाएं इसे पौधे के रूप में भी स्थापित करती हैं और फिर इसे फूलों से सजा कर देवी-देवताओं का आसन बनाती हैं. फुलेरे पर ही गणेशजी, गौरीजी और भगवान शिव की प्रतिकात्मक स्थापना होती है. इसलिए इसे पूजा का सबसे महत्वपूर्ण घटक माना गया है.

हरतालिका तीज में फुलेरा केवल सजावट नहीं बल्कि आस्था और पवित्रता का केंद्र है. यह शिव-पार्वती की उपस्थिति का प्रतीक है और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति का माध्यम है. यही कारण है कि इसे व्रत की आत्मा कहा गया है. बिना फुलेरा बांधे न तो मंडप सजता है और न ही तीज की पूजा पूर्ण होती है. इस तरह, फुलेरा केवल फूलों का मंडप नहीं बल्कि वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि और दांपत्य सौभाग्य का दिव्य प्रतीक है. यही कारण है कि पीढ़ियों से महिलाएं इसे बड़े मनोयोग से बनाती और सजाती आ रही हैं. व्रत की सच्ची पूर्णता तभी मानी जाती है जब फुलेरा स्थापित करके गौरी-शंकर का पूजन किया जाए.

क्या है फुलेरा?

फुलेरा फूलों और पत्तियों से बनायी जाने वाली एक विशेष प्रकार की पूजा सजावट है. हरतालिका तीज पर महिलाएं मिट्टी से शिवलिंग और माता पार्वती की प्रतिमा बनाती हैं, मंडप सजाती हैं और उनके ऊपर फुलेरा बांधती हैं. इसमें फूलों की पांच लड़ियां बांधी जाती हैं, जिन्हें शिव-पार्वती की पांच दिव्य पुत्रियों,जया, विषहरा, शामिलबारी, देव और दोतली का प्रतीक माना जाता है.

तीज व्रत में फुलेरे का महत्व

  1. पूजन का आधार तीज में गौरी-शंकर को फुलेरे के नीचे विराजमान किया जाता है. यह उनका पवित्र आसन है.
  2. पुत्रियों का प्रतीक पांच फूलों की मालाएं भगवान भोलेनाथ की पांच पुत्रियों का प्रतिनिधित्व करती हैं.
  3. प्रकृति और समर्पण का प्रतीक फुलेरा न सिर्फ फूलों की सजावट है, बल्कि यह प्रकृति की प्रचुरता और देवी पार्वती के प्रति समर्पण का द्योतक है.
  4. दर्शन का महत्व मान्यता है कि यदि कोई स्त्री हरतालिका तीज का व्रत नहीं कर पा रही है, तो केवल फुलेरा के दर्शन करने मात्र से ही उसे शिव-पार्वती का आशीर्वाद मिल जाता है.
  5. धार्मिक फल फुलेरा के दर्शन को काशी और सोमनाथ के शिवदर्शन के समान फलदायी माना गया है.

कैसे बनता है फुलेरा?

फुलेरा बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के फूलों के साथ अशोक और आम की पत्तियों का प्रयोग किया जाता है. इन्हें मिलाकर पांच सुंदर मालाएं बनाई जाती हैं और फिर उन्हें मंडप में शिव-पार्वती की प्रतिमा के ऊपर बांधा जाता है. यह पूरा दृश्य घर में एक दिव्य वातावरण बना देता है.

विशेष नियम

फुलेरा के बिना तीज व्रत को अधूरा माना जाता है.

पूजा के बाद इसके फूल और पत्तियों को कभी फेंका नहीं जाता. इन्हें नदी या जल प्रवाह में प्रवाहित करना आवश्यक होता है, वरना दोष लग सकता है.

क्षेत्रीय परंपराएं और मान्यताएं

राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर भारत के कई हिस्सों में फुलेरे की परंपरा बेहद लोकप्रिय है. कहीं इसे गोरी-शंकर की झांकी माना जाता है तो कहीं इसे फूलों का मंडप. ग्रामीण इलाकों में महिलाएं एक-दूसरे के फुलेरे देखने जाती हैं और इसे सजाने में विशेष उत्साह दिखाती हैं.

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. एम पी न्यूज कास्ट  इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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