गोबर की मूर्तियां भी प्रकृति के प्रति एक सकारात्मक प्रयास है. आगर मालवा जिले की ग्रामीण महिलाओं ने गणेशोत्सव की तैयारी पहले ही शुरू कर दी है. शहर के बड़े मॉल और ऑनलाइन ब्रांड्स से मुकाबले की ये कहानी एक मूर्तिकार की नजर से आज आपको हम बताने जा रहे हैं. गाय के गोबर से गणेश जी की मूर्ति गढ़ते हुई ये महिलाएं अपने परिवार की आजीविका भी चला रही हैं.
गांव की महिलाएं बना रही गोबर से मूर्ति
लाडवन गांव में महिलाएं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अपनी भूमिका से बदलाव लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं. इसी गांव की 50 साल की रम्भा बाई की आंखों में उनके बेटों के लिए नहीं, बल्कि धरती के लिए चिंता नजर आती है. उनके हाथ मूर्ति की बारीकियों को संवारते हैं, ताकि विसर्जन के बाद ये मूर्ति पानी में घुलकर, धरती को जीवन लौटाए और जहर नहीं.
रम्भा बाई ने कहा कि गांव में कुल 35 महिलाओं की ट्रेनिंग हुई थी. रम्भा बाई ने एनडीटीवी से कहा कि मेरे दो बेटे हैं. मैं बस दोनों बेटों के लिए नहीं सोच रही, बल्कि देश के सभी बेटों के लिए सोच रही हूं. गाय के गोबर से मूर्ति बनाने का ख्याल ऐसे आया कि प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्ति को नदी-नाले में डूबा देते हैं, तो उससे जानवर भी मरता है और गलता भी नहीं है. इसी पानी को पशु-पक्षी और मनुष्य भी पीते हैं.
रम्भा बाई आत्मविश्वास से भरे चेहरे के साथ एक बार फिर अपनी कहानी कहती हैं कि उन्होंने अपने घरवालों से गणपति जी की शुरुआत करने के लिए पैसे मांगे थे. लेकिन, परिवार ने जवाब दिया था कि 300 रुपये की मजदूरी मिलती है, इसमें घर ग्रहस्ती कैसे चल सकती है. इसके बाद उन्होंने लाडली बहना के पैसे खाते से निकाले और आजीविका मिशन के अधिकारियों से बात करके पहले सांचे मंगवाए, फिर गाय का सुखा गोबर और प्रीमिक्स पाउडर मंगवाया और शुरुआत कर दी.


