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जब जिम्मेदारी छात्रों की देखभाल की हो और काम हो आदिवासी बच्चों को संरक्षण देने का ,तब क्या साहब की जीहजुरी ज़रूरी है क्या,, या फिर बच्चों का उज्वल भविष्य,।
गौरतलब यह है कि कटनी जिले के आदिम जाति कल्याण विभाग में जिला संयोजक विमल कुमार चौरसिया 25जून मंगलवार जनसुनवाई के दिन छात्रावास निरीक्षण दौरे पर रीठी,चिखला एससी,एसटी पांच छात्रावासो का निरीक्षण किया ।परंतु यह निरीक्षण सिर्फ एक कागजी खानापूर्ति तक ही सीमित है अंदर की बात ही तो और कुछ है l
वही बच्चों से भरा एससी,एसटी छात्रावास को लावारिस की तरह छोड़कर बड़वारा अधीक्षक
संजय कुशवाहा जी साहब के हमसफर बनकर निरीक्षण के नाम पर सैर-सपाटा करने मैं लगे रहे हैं l बात यही नहीं रुकती, बल्कि सूत्रों से मिली जानकारी अनुसार 16 जून से लेकर आज तक नितेश त्रिपाठी छात्रावास कटनी कैंप,श्रीमति सुचेता तिवारी छात्रावास घुघरा, श्रीमति हेमलता बैरागी छात्रावास बरगवां (कटनी) सभी अधीक्षक अपने-अपने हॉस्टल का काम छोड़कर साहब की सेवा में जिला कार्यालय मे जुटे हुए हैं। जबकि इनका कार्य छात्रों के नामांकन की व्यवस्था, भोजन की निगरानी, और सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। जब ये अधीक्षक अपनी जिला मे सेवाए देने में लगे हुए हैं,तो छात्रावासों में नामांकन कौन कर रहा है?चपरासी या अन्य स्टाफ, जो न तो अधिकृत हैं, न ही प्रशिक्षित।
वहीं बच्चों की देखरेख और उनके भोजन व्यवस्था की जिम्मेदारी भी सवालों के घेरे मैं है। अब सवाल यह उठाता हैं कि जब शासन सर्व शिक्षा अभियान के तहत शिक्षा का अलख जगाने लगी हुई है । तो क्या बच्चों की पढ़ाई, सुरक्षा और विकास,इन अधीक्षकों के लिए कोई मायने नहीं रखता। नए शिक्षा सत्र में अधिकतर छात्रावासों में एडमिशन प्रक्रिया शुरू हो जाती है जिसमे कई बच्चों का फॉर्म गलत भर जाता हैं ,तो कहीं जरूरी प्रमाणपत्रों की छायाप्रति संलग्न न होने पर मांग उन्हे लौटा दिया जाता हैं ।
यह सब उस वक्त हो रहा होगाl जब जिम्मेदार अधीक्षक छात्रावास से बेखौफ होकर नदारद होते हैं ।
अब देखना यह है कि जिले मैं बैठे उच्च अधिकारी इस विषय में क्या कार्रवाई करते हैं।
हरिशंकर बेन


