रिपोर्टर संतोष चौबे
मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग द्वारा श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पवित्र अवसर पर भोपाल सहित मध्यप्रदेश के 16 स्थानों पर श्रीकृष्ण पर्व का आयोजन किया जा रहा है। पन्ना के श्री जुगल किशोर मंदिर प्रांगण में चल रहे दो दिवसीय समारोह की अंतिम सभा सोमवार को सजी, जिसमें सागर के नदीम राईन और साथी कलाकारों ने बधाई लोकनृत्य की प्रस्तुति दी। अगली कड़ी में भोपाल की लता मुंशी और साथी कलाकारों ने नृत्य नाटिका श्रीकृष्ण की प्रस्तुति दी तो मथुरा के हेमंत बृजवासी और साथी कलाकारों ने भक्ति संगीत के रस की धारा में श्रोताओं को भिगो दिया।
नदीम के 16 सदस्यीय दल ने बधाई लोकनृत्य पेश किया। बुन्देलखण्ड अंचल में जन्म विवाह और तीज-त्यौहारों पर बधाई नृत्य किया जाता है। मनौती पूरी हो जाने पर देवी-देवताओं के द्वार पर बधाई नृत्य होता है। इस नृत्य में स्त्रियाँ और पुरुष दोनों ही उमंग से भरकर नृत्य करते हैं। बूढ़ी स्त्रियाँ कुटुम्ब में नाती-पोतों के जन्म पर अपने वंश की वृद्धि के हर्ष से भरकर घर के आंगन में बधाई नाचने लगते हैं। नेग न्यौछावर बांटती हैं। मंच पर जब बधाई नृत्य समूह के रूप में प्रस्तुत होता है, तो इसमें गीत भी गाये जाते हैं। बधाई के नर्तक, चेहरे के उल्लास, पद संचालन, देह की लचक और रंगारंग वेशभूषा से दर्शकों का मन मोह लेते हैं। इस नृत्य में ढपला, टिमकी, रमतूला और बांसुरी आदि वाद्य प्रयुक्त होते हैं।
अगली कड़ी में हेमंत बृजवासी ने अपनी मधुर आवाज में भक्ति गीतों की प्रस्तुति देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने राधे-राधे कीर्तन से अपनी प्रस्तुति का आगाज किया। अरज सुनो मोरी…गीत गाकर उन्होंने श्रोताओं को अपने साथ जोड़ लिया तो किशोरी कुछ ऐसा इंतजाम हो जाए…गीत गाकर फिजाओं में भक्ति रस के रंग घोल दिए। काली कमली वाला मेरा यार है…और मस्ती में रंग मस्ताने हो गए, श्याम तेरे नाम के दीवाने…और कजरारे तेरे मोटे मोटे नैन…जैसे गीतों के साथ श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया।
भोपाल की लता मुंशी ने कृष्ण गाथा में परम्परा और प्रयोग का अद्भुत संगम समाहित किया। शास्त्रीय नृत्य की परम्परा अनुसार प्रथम प्रस्तुति पुष्पांजलि की रही, जिसमें गुरु, ईश्वर, रंगभूमि और दर्शकों को प्रणाम करते हुए शुरुआत की गई। दूसरी प्रस्तुति में दिखाया गया कि मां यशोदा छोटे से बालक कान्हा को गोद में लेकर हंसती हैं, खेलती हैं और प्यार से पालने में सुलाने की कोशिश करती हैं। वे अपने कान्हा पर इतना मोहित हैं कि उन्हें एक पल के लिए भी अपनी आंखों से ओझिल नहीं होने देना चाहती। तीसरी प्रस्तुति में दिखाया गया कि कृष्ण अब घुटने चलने लगे हैं। खेलते-खेलते वे बाहर आंगन में आ जाते हैं, आंगन में मिट्टी में खेलते समय मिट्टी उनके मुंह में चल जाती है, उसका स्वाद उन्हें बहुत पसंद आता है। उन्हें मिट्टी खाता देख मां यशोदा नाराज होती हैं, वे उनके कान पकड़कर उन्हें उठाने की कोशिश करती हैं। कृष्ण अपना मुंह खोलकर मां यशोदा को तीनों लोकों के दर्शन कराते हैं। चौथी प्रस्तुति में दिखाया गया कि किशोर उम्र में कृष्ण दोस्तों के साथ खेलते हैं, गाते हैं, नाचते हैं, खूब मस्ती करते हैं। ऐसा करते हुए वह कालिया मर्दन, रुक्मिणी हरण, राम के अवतार में सीता स्वयंवर और अंत में द्रोपदी चीर हरण के समय उनकी लाज बचाने जैसे कार्य भी करते हैं। ये प्रस्तुति राग दुर्गा आदिताल में निबद्ध थी। पांचवीं प्रस्तुति में राग धमन ताल आदि में राधा-कृष्ण के प्रेम और छठवीं प्रस्तुति में राग मोहनम् और ताल एकम में विश्व की मंगल कामना की गई।
जन्माष्टमी पर्व की संध्या पर श्री जुगल किशोर मंदिर परिसर में संस्कृति विभाग के श्री कृष्ण पर्व कार्यक्रम में पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं विधायक बृजेन्द्र प्रताप सिंह, नपाध्यक्ष मीना पाण्डेय सहित कलेक्टर सुरेश कुमार, जिला पंचायत सीईओ संघ प्रिय, सीएमओ शशिकपूर गढ़पाले एवं अन्य जनप्रतिनिधिगण व अधिकारी तथा बड़ी संख्या में नगरवासी उपस्थित रहे।
प्रथम दिवस कलाकारों ने श्री कृष्ण लीला और प्रसंगों का किया मंचन
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा जन्माष्टमी की पूर्व संध्या एवं हरछठ पर्व पर रविवार को दो दिवसीय श्री कृष्ण पर्व का शुभारंभ किया गया था। पहले दिन के समारोह में खजुराहो के गणेश रजक और साथी कलाकारों ने देवारी लोकनृत्य, पन्ना की गायत्री द्विवेदी और साथी कलाकारों ने लोकगायन तथा मुम्बई के रवि त्रिपाठी और साथियों ने भक्ति संगीत की प्रस्तुति दी।
गायत्री द्विवेदी और साथी कलाकारों ने सरस्वती वंदना करिए माँ वाणी को वंदन… से कार्यक्रम की शुरुआत की। सभा को विस्तार देते हुए पन्ना के जुगल किशोर मुरलिया में हीरा जड़े हैं… गीत पेशकर माहौल को भक्ति रस में सराबोर कर दिया। इसके बाद रसिया बुंदेली- लल्ला की पैजनियॉं बाजे रे…, बधाई गीत-मथुरा में जन्मे कन्हैया…,कृष्ण विरह गीत-हमें तो जोगनियॉं बनाये गयो री…,कहूं खेलन निकर गए हमारे ललना…,आज दिन सोने को महाराज (सोहर)…गीतों की प्रस्तुति देकर मंदिर परिसर के माहौल को भक्तिमय बना दिया। राधे कौन से पुण्य किए तूने…गीत पेशकर अपनी वाणी को विराम दिया।
खजुराहो के गणेश रजक और साथी कलाकारों ने देवारी लोकनृत्य के माध्यम से बुंदेलखंड की परंपरा और विरासत को मंच पर जीवंत कर दिया। बुंदेलखंड का यह लोकनृत्य पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। प्रभु श्रीराम लंका पर विजय प्राप्त कर अयोध्या आए थे, उस खुशी में अयोध्यावासियों ने यही लोकनृत्य किया था। इस लोकनृत्य को करने वाले कलाकार जिस दिन नृत्य प्रस्तुति देते हैं, उससे पहले मौन धारण करते हैं और व्रत भी करते हैं। शाम को पूजन के बाद ही भोजन किया जाता है। इस लोकनृत्य में पारंपरिक वाद्ययंत्र नगड़िया, ढोलक, मंजीरा, रमतुला और अलगुजा की तान पर इसे किया जाता है। नृतक के हाथ में मोरपंख की अनोखी शोभा होती है। दिवारी लोकगायन से इसकी शुरुआत होती है और पाई डंडा खेलते हुए इस लोकनृत्य का समापन किया जाता है।
मुंबई के रवि त्रिपाठी और साथियों ने मोरे कृष्णा…,हमारे साथ श्री भगवान तो किस बात की चिंता…,श्रीकृष्ण गोविंद…,श्याम तेरी बंशी…,अच्युतम केशवम…,किशोरी कुछ ऐसा…,मेरे भगवान आये है…,मेरी माँ के बराबर कोई नहीं…,पन्ना के युगल किशोर हो…,बड़ी देर भई…और मेरा आप की कृपा से…जैसे भक्ति गीतों की प्रस्तुति दी। बम भोले…गीत से भगवान शिव की भक्ति रस की धारा बहाकर अपनी वाणी को


