रिपोर्टर प्रिया दुबे
माता पार्वती की सहेलियां उनका हरण कर जंगल में लायी थीं, इसलिए इस व्रत को हरतालिका तीज के नाम से जाना जाता है. यह व्रत सर्वप्रथम पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए किया था.
इस दिन स्त्रियां सौभाग्य वृद्धि के लिए शिव-पार्वती की पूजा करती हैं और कठोर निर्जल उपवास के साथ रात्रि जागरण भी करती हैं. जीवन में वैधव्य का सामना न करना पड़े और पुत्र-पौत्र से घर भरापूरा रहे, इसकी भी प्रार्थना वे महादेव से करती हैं.
जब हम तीज की पूजा के मूल तत्व की बात करते हैं, तो हमारे समक्ष शिव-पार्वती का अथाह, अद्वितीय प्रेम ही प्रकट होता है. एकतरफा प्रेम नहीं, जिसमें स्वार्थ- ही स्वार्थ होता है. यह है दांपत्य जीवन की वैचारिक एकता. यही है- ‘त्वमेव सर्वम्’ की पराकाष्ठा.
शिव-शिवा में अभेद है, इसलिए शिवा के बिना शिव शव हैं, तो शिव के बिना शिवा निराधार, निरुपाय. इसीतथ्य का उद्घाटन यह श्लोक करता है –
निर्गुणः सगुणश्चेति शिवो ज्ञेयः सनातनः ।
निर्गुणः प्रकृतेः अन्यः सगुणः सकलः स्मृतः।।
यानी; भगवान महेश्वर निराकार और साकार भी हैं. प्रकृति (शक्ति, माया, पार्वती) से रहित निर्गुण तथा प्रकृतियुक्त सगुण.
कैसे हुई हड़तालिका व्रत की उपज!!!!
यही शिवशक्ति का संयोग संसार का कारण, तात्विक प्रेम का पर्याय एवं दांपत्य का सूत्र है. दोनों का प्रेम कब से रहा, कैसे रहा; जानना, कहना असंभव है. कारण कि ये देश-काल से परे हैं. हां; पौराणिक आख्यानों में पहला मिलन दक्षपुत्री के रूप में सती से हुआ. पिता दक्ष द्वारा पति-परमेश्वर का अपमान जान उन्होंने यज्ञाग्नि में स्वयं को आहुत कर दिया. परिणाम यह कि शक्तिहीन शिव विरक्त हो गये. इधर देवकार्य में बाधायें आने लगीं, तो देवों की प्रार्थना पर गिरिराज के घर पार्वती रूप में वही आद्या शक्ति सती अवतरित हुईं. उधर शिव साधना में, इधर गिरिनंदिनी भी. ‘हरितालिका व्रत’ की उपज पार्वती की उसी प्रेमसाधना से हुई. बिघ्न-बाधाओं का जोर सबके साथ होता है, इनके साथ भी रहा, परंतु शाश्वत, निश्छल, अनन्य प्रीति एक-दूजे की हो ही गयी.
यही कारण है कि जब शिव की पूजा होती है, तो शिवा भी पूजी जाती हैं. इसी तरह जहां शिवा की पूजा होती है, वहां शिव भी पूजे जाते हैं. तीज गौरी की तिथि है,पर इसमें भी दोनों की साथ-साथ उपासना-आराधना होती है. यह सौभाग्य-वृद्धि के लिए है, शिव-पार्वती के समान पारस्परिक प्रेम की प्रगाढ़ता के लिए है. हमारी संस्कृति इसी रूप में इस व्रत को स्थान देती आयी है.
सरगही करना कितना उचित!
प्राय: स्त्रियां तीज आदि व्रतों में सूर्योदय पूर्व सरगही करती हैं. हालांकि, भारतीय संस्कृति में सरगही का कोई विधान नहीं है. ऐसा कठिन व्रत कर पाना सभी व्रतियों के सामर्थ्य में नहीं. संभवत: इसीलिए यह परंपरा चली. वास्तव में यह आयातित प्रथा है. अगर सनातन दृष्टिकोण से देखें तो बिना सरगही व्रतारंभ करना उत्तम है।
देवी पार्वती और भगवान शिव के अटूट रिश्ते को ध्यान में रखकर किये जाने वाले अखंड सौभाग्य के प्रतीक पर्व हरतालिका तीज की सभी माता बहनों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई।।


