ब्यूरो चीफ हरिशंकर बेन
पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन द्वारा इराक के कर्बला ए मैदान में, दी गई कुर्बानी की याद में मनाए जाने वाले शहादत के पर्व मुहर्रम की दसवीं तारीख को
कटनी जिले के रीठी नगर में शाम को ताजिया और सवारियों का जुलूस निकाला गया ।
मुस्लिम धर्मावलंबियों द्वारा मोहर्रम मातमी पर्व पर ताजिया जुलूस में मुनीर खान अखाड़े की ताजिया व सवारी ,गफूर खान अखाड़े की ताजिया, झिराई की ताजिया व सवारी , सलीम बाबा की सवारी शामिल रही ।
बैंड बाजों के साथ अपने अपने इमामबाड़ा से ताजिया व सवारियां उठकर रीठी नगर का गस्त करते हुए थाने से वापस गोल बाजार मैं इमाम हुसैन की याद करते हुए छोटे छोटे बालकों ने भी अपने करतब दिखाए वही मुस्लिम महिलाओं के द्वारा मरसिया भी पढ़ा जा रहा था ।
लगभग एक घंटे तक बारिश की फुहारों के बीच करतब दिखाने के बाद सारी सवारीया व ताजिया बस स्टैंड से गस्त करते हुए सिंघिया कर्बला में पहुंचकर ठंडे हुए ।
इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार साल का पहला महीना मोहर्रम का होता है. इसे ‘ग़म का महीना’ भी माना जाता है.। बताया जाता है की 12वीं शताब्दी में ग़ुलाम वंश के पहले शासक क़ुतुबुद्दीन ऐबक के समय से ही ताज़िये से एक ही आवाज़ सुनाई दे रही होती है- “या, हुसैन, हम ना हुए”. इसका मतलब होता है, “हमें दुख है इमाम हुसैन साहब कि कर्बला की जंग में हम आपके लिए जान देने को मौजूद न थे.”
पैग़ंबर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद के नवासे हज़रत इमाम हुसैन को इसी मोहर्रम के महीने में कर्बला की जंग (680 ईसवी) में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था.
इस मातमी पर्व मोहर्रम में मुसलमान हज़रत इमाम हुसैन की इसी शहादत को याद करते हैं.।
हरिशंकर बेन


