पत्रकार राजकुमार दुबे
वर्दी
वर्दी होती है खाकी,
खाकी के नीचे होता है एक हाड़ माँस का इंसान।
उसके भी होते हैं जज़्बात,
वह भी करना चाहता है खुलकर बात।
अक्सर वर्दी के नीचे दफ्न हो जाती हैं कई आरजुएं, अनगिनत सपने…
कत्थई काले जूतों के नीचे न चाहते हुए भी छोड़ना पड़ती है उदासी, बेबसी और लाचारी।
कमर पर बांधा बेल्ट बहुत छोटा होता है पर उससे बंधी होती हैं जनता की खत्म न होने वाली लंबी अपेक्षाएं…
काँधे पर सितारे होते हुए भी घर के सितारे कब सो जाते हैं पता ही नहीं चलता।
कई बार पत्नि की टूटी चूड़ियां,
बेबी की गुड़िया,
बेटे की किताब की लिस्ट धुल जाती है वर्दी के साथ,
देर से आने पर पति की डांट,
घर के काम काज,
और
थाने के राज छुपाना पड़ता है।
जनता की गाली,
नेता की धौंस,
गुंडों की फौज,
शराबियों की झिड़की,
अनजान घर के गुस्से फूटते हैं हम पर।
बेशक टोपी हमें धूप से बचाती है पर यह हमें हमारी जिम्मेदारी का एहसास कराती है,
मेरा भी मन है कभी खाकी छोड़कर पहनूं रंग बिरंगे कपड़े,
सड़कों पर करूँ धमाल,
दोस्तों संग घूमूँ फिरूँ और नाचूँ गाउँ।
मन है कोई गीत अपने होठों से गुनगुनाने का,
तस्वीरे बनाने का,
बांसुरी बजाने का,
पर
मेरे बदन पर खाकी है।
कभी-कभी मन करता है होल्डर से बाहर निकालूं रिवॉल्वर और छह की छह खाली कर दूं खुदके अंदर।
फिर सोचता हूँ,
मेरे बाद क्या होगा इस गांव, नगर, जिले और राज्य का…
इसलिए रिवॉल्वर होल्डर में वापस रखकर लौट जाता हूँ अपने घर।
बच्चे की अभी आँख लगी है,
माँ की नजर अब भी दरवाजे पर है,
पापा के खाँसने से पता चल रहा है वह भी जागे हैं,
बिटिया सोने का नाटक कर रही है,
बेटा पढ़ रहा है,
और
पत्नि भूखी है हर दिन की तरह।
बस थोड़ा कमर सीधी करते ही,
आती है अजान की आवाज,
घंटों की टन टन,
मैं फिर बन ठन….
खाकी पहनकर निकल पड़ता हूँ,
देशभक्ति जनसेवा करने।
– नरसिंहपुर
मैं खाकी हूँ… और मैं ही मध्यप्रदेश पुलिस हूँ*
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