इंजीनियरिंग छोड़ चुनी खेती की राह, आज हजारों किसानों के लिए बने प्रेरणा
प्राकृतिक खेती, पशुपालन और नवाचार से आत्मनिर्भरता की मिसाल बने कुलदीप कौरव एवं शिवानी कौरव
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दृढ़ संकल्प, नवाचार और अपनी मिट्टी पर विश्वास हो तो खेती भी समृद्धि और आत्मनिर्भरता का सशक्त माध्यम बन सकती है। इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं चीचली विकासखंड की ग्राम पंचायत पुआरिया के युवा दंपति श्री कुलदीप कौरव एवं श्रीमती शिवानी कौरव, जिन्होंने प्राकृतिक खेती के माध्यम से सफलता की नई इबारत लिखी है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़कर खेती को अपना भविष्य बनाने का उनका फैसला आसान नहीं था, लेकिन आज यही निर्णय उन्हें न केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना चुका है, बल्कि वे जिले के किसानों के लिए एक प्रेरणादायी उदाहरण भी बन गए हैं।
शौक नहीं, जुनून बनी खेती
श्री कुलदीप कौरव ने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन उनका मन हमेशा खेत-खलिहानों और गांव की मिट्टी में ही रमता था। उन्होंने साहसिक निर्णय लेते हुए पढ़ाई छोड़ दी और खेती को अपना जीवन बना लिया। इस सफर में उनकी पत्नी श्रीमती शिवानी कौरव हर कदम पर उनके साथ रहीं। दोनों ने तय किया कि वे खेती को परंपरागत सीमाओं तक नहीं रखेंगे, बल्कि आधुनिक तकनीकों और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग से इसे लाभकारी बनाएंगे।
प्राकृतिक खेती ने बदल दी तस्वीर
शुरुआत में उन्होंने महसूस किया कि रासायनिक खेती की बढ़ती लागत और मिट्टी की घटती उर्वरता किसानों के सामने बड़ी चुनौती है। इसी सोच के साथ उन्होंने प्राकृतिक खेती को अपनाया और खेत में वर्मी कम्पोस्ट इकाई स्थापित की। गोबर, फसल अवशेष और जैविक पदार्थों से तैयार खाद ने मिट्टी की गुणवत्ता सुधारी, रासायनिक उर्वरकों पर होने वाला खर्च कम किया और उत्पादन को टिकाऊ बनाया। अतिरिक्त वर्मी कम्पोस्ट की बिक्री से उनकी आय का एक नया स्रोत भी विकसित हुआ।
खेती और पशुपालन का सफल समन्वय
उन्होंने खेती को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पशुपालन को उससे जोड़ा। पशुओं से प्राप्त गोबर का उपयोग जैविक खाद बनाने में होने लगा, जिससे खेत और पशुपालन दोनों एक-दूसरे के पूरक बन गए। पशुओं के लिए कम लागत में पौष्टिक चारा उपलब्ध कराने हेतु उन्होंने अजोला उत्पादन इकाई भी स्थापित की। इससे चारे की लागत घटी, पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर हुआ और दुग्ध उत्पादन में भी सकारात्मक परिणाम मिले।
फलदार पौधों से तैयार किया भविष्य का आधार
तात्कालिक लाभ के साथ-साथ भविष्य की आय को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने खेत में लगभग 100 नींबू, 100 आम, 50 आँवला और 20 अमरूद के पौधे लगाए। यह पहल पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आने वाले वर्षों में स्थायी आय का मजबूत आधार तैयार कर रही है। कुलदीप और शिवानी ने सब्जियों, पपीता, मुनगा, आम सहित विभिन्न पौधों की गुणवत्तापूर्ण नर्सरी विकसित की। इससे क्षेत्र के किसानों को बेहतर पौधे उपलब्ध हो रहे हैं, बागवानी को बढ़ावा मिल रहा है और उनके परिवार की आय में भी निरंतर वृद्धि हो रही है।
आज श्री कुलदीप कौरव कृषि विभाग से जुड़े बायो रिसोर्स सेंटर के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक खेती, जीवामृत, घनजीवामृत, वर्मी कम्पोस्ट और अजोला उत्पादन का प्रशिक्षण दे रहे हैं। वहीं श्रीमती शिवानी कौरव “कृषि सखी” के रूप में महिला किसानों को आधुनिक एवं प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूक कर रही हैं। उनके मार्गदर्शन से अनेक महिलाएं खेती और आजीविका गतिविधियों से जुड़कर आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं।
सालाना लगभग चार लाख रुपये की शुद्ध आय
उन्होंने बताया कि उनके परिवार में माता-पिता, उनकी पत्नी और उनके दो पुत्र हैं। उनके सभी परिवार के सदस्य खेती, वर्मी कम्पोस्ट निर्माण, पशुपालन तथा अन्य कृषि आधारित कार्यों में सहयोग करते हैं। उनका बड़ा बेटा 8 वर्ष का है और दूसरी कक्षा में पढ़ाई करता है, जबकि छोटा बेटा 4 वर्ष का है और अभी प्रारंभिक कक्षा (नर्सरी) में अध्ययनरत है। पहले उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। आय के सीमित साधन होने के कारण परिवार का खर्च चलाना और बच्चों की शिक्षा जैसी आवश्यकताओं को पूरा करना कठिन था। लेकिन कृषि आधारित गतिविधियों, वर्मी कम्पोस्ट, पशुपालन, अजोला उत्पादन तथा बागवानी जैसे कार्यों को अपनाने के बाद हमारी आय में लगातार वृद्धि हुई है। आज हमारा परिवार आर्थिक रूप से पहले की तुलना में काफी मजबूत और आत्मनिर्भर है तथा समाज में भी हमारी एक अच्छी पहचान और सम्मान बना है। वर्मी कम्पोस्ट, नर्सरी, पशुपालन और प्राकृतिक खेती आधारित समन्वित मॉडल से आज उन्हें प्रतिवर्ष लगभग चार लाख रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हो रही है। उनकी सफलता यह साबित करती है कि यदि खेती वैज्ञानिक सोच और नवाचार के साथ की जाए तो यह सम्मानजनक और लाभकारी आजीविका का मजबूत माध्यम बन सकती है।
आज उनका खेत एक “लर्निंग फार्म” बन चुका है, जहां किसान, युवा और स्व-सहायता समूहों के सदस्य प्राकृतिक खेती की तकनीकें सीखने पहुंचते हैं। कुलदीप और शिवानी पूरे मन से अपने अनुभव साझा करते हैं, ताकि अधिक से अधिक किसान कम लागत में अधिक लाभ वाली टिकाऊ खेती अपनाकर आत्मनिर्भर बन सकें।
श्री कुलदीप कौरव कहते हैं, “प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद हमारी लागत कम हुई, मिट्टी की सेहत सुधरी और आय लगातार बढ़ी। आज हमें सबसे अधिक खुशी इस बात की है कि हमारी सफलता देखकर दूसरे किसान भी नई सोच के साथ खेती की ओर आगे बढ़ रहे हैं।”


