पुरातत्व और कला संस्कृति में शिव,शिवत्व तथा शिव तत्व राज्य पुरातत्व संग्रहालय भोपाल में शैवोपासना के अंतर्गत इतिहास की प्राध्यापक डॉ हंसा व्यास द्वारा व्याख्यान दिया गया
रिपोर्टर सीमा कैथवास
नर्मदापुरम। शासकीय नर्मदा महाविद्यालय की इतिहास की प्राध्यापक डॉ हंसा व्यास द्वारा पुरातत्व और कला संस्कृति में शिव,शिवत्व तथा शिव तत्व राज्य पुरातत्व संग्रहालय भोपाल में शैवोपासना के अंतर्गत व्याख्यान दिया गया। साथ ही साथ संपूर्ण विश्व में सैन फ्रांसिस्को , यूएसए आदि देशों में जहां शिव और शैव परिवार की प्रतिमाएं संग्रहालय में रखी हुई है उन प्रतिमाओं के छाया चित्रों की अद्भुत और दुर्लभ प्रदर्शनी का उद्घाटन डॉ हंसा व्यास के द्वारा किया गया ।उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा आदिकाल से ही मानव संस्कृति के उस बिंदु पर पहुंचने के लिए प्रयत्नशील रहा है जहां उसकी जीवन यात्रा में शुभ मंगलमय तथा कल्याणकारी भावों के दर्शन होते हैं । सबका कल्याण और अभ्युदय भारतीय संस्कृति का ध्येय रहा है । स्व को पर के लिए अर्पित कर देने की भावना के आधार पर ही शिव तत्व सांस्कृतिक जीवन का चरम साध्य बना । शिव ही संस्कृति का वह मूल भाव है जो बीज रूप में संसार के प्रत्येक जीव में वर्तमान रहता है ।
शिव को दार्शनिक रूप में परम ब्रह्म माना गया है | शिव पुराण आदि से अंत तक उनके परम ब्रह्म स्वरूप को ही व्यक्त करता है।ऐसा कहा गया है कि सृष्टि के रचयिता पालनकर्ता तथा संहार कर्ता सब कुछ रुद्र ही हैं । संपूर्ण विश्व उन्हीं का रूप है वे कालातीत , निष्कल , सर्वज्ञ , त्रिगुणाधीश्वर एवं परात्पर ब्रम्ह हैं । स्वयं शिव को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि मैं ही सृष्टि कर्ता हूं , प्रलय कर्ता हूं , मैं ही सगुण निर्गुण सच्चिदानंद स्वरूप निर्विकार परब्रह्म परमात्मा हूँ।
पुराणों में शिव को पुरुष (ऊर्जा) और प्रकृति का पर्याय माना गया है ।यानी पुरुष और प्रकृति का सम्यक संतुलन ही आकाश, पदार्थ, ब्रह्मांड और ऊर्जा को नियंत्रित रखते हुए गतिमान बनाए रखता है। प्रकृति में जो कुछ भी है, आकाश, पाताल, पृथ्वी, अग्नि, वायु, सबमें संतुलन बनाए रखने का नाम ही शिवत्व है।
लोक आस्था में शिव का होना शिवत्व ही है । शिव का शाब्दिक अर्थ है उच्चतर चेतना ।इसे कई अन्य तरीकों से भी समझा जा सकता है। यह कह सकते हैं कि शिव का अर्थ है शुद्ध, परम पदार्थ या सृष्टि का आधार ।
पुरातत्त्व में शिवत्व – अभिलेखों में शिव स्तुतियों के संदर्भ मिलते हैं जिसमें शिव के अनेक रूपों की उपासना की गई है । शिव के अलग अलग रूप मानव कल्याणकारी भावों की अभिव्यक्ति है। शिव कहीं लिंग रूप में तो कही मुख लिंग रूप में अनेक मंदिरो में विराजित हैं तो कही अलग अलग रूप धर कर मूर्तिकला में बसकर कला और संस्कृति के वैभव को समृद्ध बनाते हैं ।
विभिन्न पर्वो, उत्सवों के आराध्य बनकर शिव जनमानस की चेतना में कुछ ऐसे रचे बसे हैं कि उनके बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यही वजह है कि पंच तत्व ही यथार्थ में शिव तत्व है।
निष्कर्ष :-
शिव ने जनमानस की सांस्कृतिक परम्पराओं को समृद्ध बनाया है। परिवार, समाज को एकता के सूत्र में बांधने में शिवत्व का महत्वपूर्ण योगदान है । शिव ,शिवत्व और शिव तत्व ने भारत के सांस्कृतिक साहित्यिक एवं कला जगत को भरपूर देन दी है ।
विषय बिंदु –
1) विषय परिचय
2)भारत में शैव धर्म की ऐतिहासिकता
3) अभिलेखों में शिव
4)मंदिर स्थापत्य कला में शिव 5)लोकमानस की चेतना में शिव 6)शिव और शिवत्व
कार्यक्रम में पूरे विश्व के संग्रहालय में रखी हुई शिव प्रतिमाओं की प्रदर्शनी का उद्घाटन संग्रहालय के सभी अधिकारियों, शोधार्थीै के साथ किया।


