हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व माता लक्ष्मी, भगवान श्रीकृष्ण और चंद्रदेव की आराधना से जुड़ा है। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी चांदनी अमृत के समान गुणकारी मानी जाती है।
क्यों मनाई जाती है शरद पूर्णिमा?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। इसी कारण इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। ‘कोजागरी’ का अर्थ है—कौन जाग रहा है? इस दिन श्रद्धालु रात में जागकर माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
वहीं, भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति परंपरा में शरद पूर्णिमा का संबंध महारास से भी जोड़ा जाता है। ब्रज क्षेत्र में इस पर्व को विशेष उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
शरद पूर्णिमा की पूजा विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
पूजा स्थल की सफाई करके माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
दीपक जलाकर रोली, अक्षत, पुष्प, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
माता लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करें और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
रात में चंद्रमा के दर्शन करें और परंपरा के अनुसार अर्घ्य अर्पित करें।
श्रद्धानुसार खीर बनाकर भगवान को भोग लगाएं और परिवार के सदस्यों में प्रसाद वितरित करें।
कई परिवारों में रात को जागरण, भजन-कीर्तन और लक्ष्मी पूजन करने की परंपरा है।
शरद पूर्णिमा की रात खीर क्यों रखी जाती है?
शरद पूर्णिमा पर दूध और चावल से बनी खीर को चांदनी में रखने की परंपरा प्रचलित है। धार्मिक विश्वास है कि इस रात चंद्रमा की किरणें अमृतमयी होती हैं। इसलिए लोग खीर को कुछ समय के लिए खुले, स्वच्छ स्थान पर रखते हैं और बाद में प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
हालांकि, चांदनी में रखी खीर के औषधीय गुण बढ़ने के दावे का ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। खीर को खुले में रखते समय धूल, कीड़े और अन्य दूषित पदार्थों से बचाना चाहिए।
शरद पूर्णिमा का संदेश
शरद पूर्णिमा हमें भक्ति, सकारात्मकता, परिवार के साथ समय बिताने और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु माता लक्ष्मी से सुख-समृद्धि, भगवान श्रीकृष्ण से प्रेम और चंद्रदेव से शीतलता की कामना करते हैं।
नोट: शरद पूर्णिमा की पूजा का शुभ मुहूर्त और तिथि स्थानीय पंचांग के अनुसार देखना उचित है।


