नई छत से टपक रहा पानी, दीवारों पर सीलन; शाम 6 बजे खुलता है और सुबह 8 बजे फिर लग जाता है ताला
सरकारी भवन की निर्माण गुणवत्ता और संचालन व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल, तकनीकी जांच की मांग
बरही। गरीब, बेसहारा, मजदूर और बाहर से आने वाले जरूरतमंद लोगों को रात में सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से नगर परिषद बरही द्वारा खितौली मार्ग स्थित पुराने बस स्टैंड में राम मेडिकल के ऊपर तैयार कराए गए रैन बसेरा का 15 अगस्त को क्षेत्रीय विधायक संजय सत्येन्द्र पाठक द्वारा लोकार्पण किया गया था। लोकार्पण के समय इसे जरूरतमंदों के लिए महत्वपूर्ण सुविधा और सुरक्षित रात्रि विश्राम का केंद्र बताया गया, लेकिन लोकार्पण के कुछ ही दिनों बाद रैन बसेरा की निर्माण गुणवत्ता और संचालन व्यवस्था सवालों के घेरे में आ गई है।
नई छत बारिश नहीं रोक पा रही पानी
रैन बसेरा भवन की स्थिति को लेकर सामने आ रही जानकारी ने सरकारी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार बारिश के दौरान भवन की छत से पानी टपक रहा है और दीवारों पर सीलन व नमी दिखाई दे रही है। सीलिंग का काम भी सवालों के घेरे में बताया जा रहा है।
जिस भवन का लोकार्पण अभी कुछ दिन पहले ही हुआ हो, उसमें पहली बारिश के दौरान ही पानी का रिसाव और सीलन दिखाई देना अपने आप में गंभीर विषय है। सवाल उठ रहा है कि यदि निर्माण कार्य के दौरान गुणवत्ता का ध्यान रखा गया था तो इतनी जल्दी भवन की छत और दीवारों में नमी की स्थिति कैसे निर्मित हो गई?
रैन बसेरा या सिर्फ रात के लिए सुविधा?
जानकारी के मुताबिक रैन बसेरा में कर्मचारी की तैनाती है और इसे शाम करीब 6 बजे खोला जाता है तथा सुबह 8 बजे बंद कर दिया जाता है। यानी दिन के समय भवन पर ताला लगा रहता है।
हालांकि यदि नगर परिषद ने इसके संचालन का समय निर्धारित किया है तो उसे स्पष्ट रूप से सार्वजनिक किया जाना चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि जरूरतमंद व्यक्ति को यदि दिन के समय किसी कारणवश आश्रय की आवश्यकता पड़े तो वह कहां जाएगा? क्या रैन बसेरा की संचालन व्यवस्था जरूरतमंदों की वास्तविक आवश्यकता को ध्यान में रखकर बनाई गई है या केवल निर्धारित समय पूरा करने तक सीमित है?
लोकार्पण के बाद ही उठे सवाल, जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर भी नजर
सरकारी राशि से तैयार सार्वजनिक भवनों का निर्माण केवल लोकार्पण तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनकी मजबूती, उपयोगिता और लंबे समय तक सुरक्षित संचालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। रैन बसेरा सीधे तौर पर गरीब और बेसहारा लोगों से जुड़ी सुविधा है। ऐसे भवन में शुरुआती दौर में ही पानी का रिसाव और सीलन सामने आना गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है। नगरवासियों का कहना है कि सिर्फ ऊपर से लीपापोती या मरम्मत कर मामले को खत्म करने के बजाय पूरे निर्माण की तकनीकी जांच कराई जानी चाहिए।
कितने में बना रैन बसेरा, किसने कराया निर्माण?
अब मांग उठ रही है कि नगर परिषद सार्वजनिक रूप से बताए कि रैन बसेरा के निर्माण पर कितनी राशि खर्च हुई, निर्माण एजेंसी या ठेकेदार कौन है, निर्माण की तकनीकी जांच किस अधिकारी ने की और कार्य की गुणवत्ता प्रमाणित किस आधार पर की गई। साथ ही भवन की छत, सीलिंग, जल निकासी और दीवारों की तकनीकी जांच कराई जाए। यदि निर्माण कार्य में वास्तव में गुणवत्ता संबंधी कमी पाई जाती है तो जिम्मेदारी तय करते हुए संबंधित एजेंसी के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
लोकार्पण की चमक या जरूरतमंदों का वास्तविक सहारा?
रैन बसेरा का उद्देश्य केवल भवन तैयार कर उसका लोकार्पण कर देना नहीं, बल्कि जरूरतमंद व्यक्ति को सुरक्षित और सम्मानजनक आश्रय उपलब्ध कराना है। ऐसे में अब नगर परिषद और प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ संचालन व्यवस्था को प्रभावी बनाना और दूसरी तरफ निर्माण गुणवत्ता पर उठ रहे सवालों का जवाब देना।
15 अगस्त को जिस रैन बसेरा को जरूरतमंदों के सहारे के रूप में जनता को समर्पित किया गया था, उसकी छत से कुछ ही दिनों में पानी टपकने और दीवारों पर सीलन के आरोप आखिर किस ओर इशारा कर रहे हैं?
अब बड़ा सवाल यही है कि नगर परिषद और प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराकर हकीकत सामने लाएगा या फिर मरम्मत के नाम पर सवालों पर ही पर्दा डाल दिया जाएगा? नगरवासियों की निगाहें अब जिम्मेदार अधिकारियों की कार्रवाई पर टिकी हैं।


