कटनी जिले के रीठी वन मंडल क्षेत्र में तेंदूपत्ता संग्रहण सीजन शुरू होते ही बड़ी संख्या में ग्रामीण मजदूर जंगलों की ओर निकल पड़े हैं। तेंदूपत्ता, जिसे स्थानीय स्तर पर “हरा सोना” कहा जाता है, आदिवासी और वनवासी परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन माना जाता है। लेकिन इस बार तेंदूपत्ता फड़ों पर मजदूरों को मूलभूत सुविधाएं तक नसीब नहीं हो रही हैं। भीषण गर्मी के बीच मजदूर घंटों धूप में खड़े होकर पत्तों की गिनती करवाने को मजबूर हैं, जबकि जिम्मेदार अधिकारी और प्रबंधन मौन बने हुए हैं।
मई की तपती गर्मी में सुबह चार बजे से ही ग्रामीण महिलाएं, पुरुष और बच्चे जंगलों में तेंदूपत्ता तोड़ने निकल जाते हैं। हिंसक जानवरों का खतरा, सर्पदंश की आशंका और तेज धूप के बीच मजदूर दिनभर पत्ते इकट्ठा कर उनकी गड्डियां तैयार करते हैं। ग्रामीण परिवारों के लिए यही सीजन सालभर की जरूरतें पूरी करने की उम्मीद लेकर आता है। बच्चों की पढ़ाई, शादी-ब्याह और घरेलू खर्चों के लिए लोग इसी आय पर निर्भर रहते हैं।
तेंदूपत्ता संग्रहण कार्य का संचालन मध्यप्रदेश राज्य लघु वनोपज संघ के माध्यम से किया जाता है, जिसमें वन विभाग और प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों की अहम भूमिका होती है। रीठी, बिलहरी और सिहुंडी समितियों के अंतर्गत कई फड़ बनाए गए हैं, जहां मजदूरों के लिए पेयजल, छाया, बैठने की व्यवस्था और प्राथमिक उपचार जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराना अनिवार्य माना जाता है। साथ ही नियमों के अनुसार प्रत्येक फड़ पर सूचना बोर्ड लगाया जाना भी जरूरी होता है।
वीओ-3
लेकिन रीठी क्षेत्र के कई तेंदूपत्ता फड़ों पर व्यवस्थाओं की पोल खुलती नजर आ रही है। मजदूरों का आरोप है कि ना तो पीने के पानी की व्यवस्था है, ना बैठने के लिए छांव और ना ही प्राथमिक उपचार की कोई सुविधा। कई जगहों पर सूचना बोर्ड तक नहीं लगाए गए हैं, जिससे पारदर्शिता पर भी सवाल उठ रहे हैं। मजदूरों का कहना है कि कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें उनके श्रम के अनुरूप मेहनताना नहीं मिल पाता, जबकि ठेकेदार और प्रबंधन लगातार लाभ कमा रहे हैं।
“सुबह से धूप में खड़े रहते हैं, पानी तक की व्यवस्था नहीं है… मेहनत बहुत है लेकिन कमाई उतनी नहीं मिलती।”
तेंदूपत्ता को भले ही “हरा सोना” कहा जाता हो, लेकिन इसे जंगलों से निकालने वाले मजदूर आज भी बदहाल परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन और जिम्मेदार विभाग मजदूरों की समस्याओं पर कब तक ध्यान देते हैं।
रिपोर्टर हरिशंकर बेन


