रीठी स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई कई बार किसी बड़े आंकड़े या रिपोर्ट से नहीं, बल्कि एक छोटे से संदेश से सामने आ जाती है। ऐसा ही एक संदेश हाल ही में आज सुबह 11 बजे सोशल मीडिया पर वायरल हुआ,l जहा रीठी बीएमओ ने खुद पोस्ट किया कि सीएचसी रीठी में डॉक्टर दोपहर 12 बजे से शाम तक उपलब्ध नहीं रहेंगे, क्योंकि उन्हें कटनी में जरूरी काम और मीटिंग में जाना है।”
यह सूचना जारी होते ही क्षेत्र के लोगों को,मानो यह समझ में आया कि,बीमारी भी अब सरकारी समय सारिणी देखकर ही आएगी। अगर किसी को बुखार, दर्द या कोई अचानक परेशानी या आकस्मिक अप्रिय घटना हो जाए हो जाए तो उसे भी शायद यही सलाह दी जा सकती है कि “भाई साहब, शाम तक इंतजार कर लीजिए, डॉक्टर साहब मीटिंग में हैं।”
रीठी सरकारी अस्पताल वैसे भी लंबे समय से संसाधनों और डॉक्टरों की कमी से जूझता रहा है। लेकिन इस बार तो व्यवस्था ने खुद ही मान लिया कि कुछ घंटों के लिए अस्पताल भगवान भरोसे ही चलने वाला है।
गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि पहले के समय में वैद्य और हकीम गांव में ही रहते थे। आधी रात को भी कोई बीमार हो जाए तो वे घर पहुंच जाते थे। अब जमाना बदल गया है—अब डॉक्टर साहब की मीटिंग हैl
और मरीजों की बीमारी को थोड़ी देर रुकना सीखना होगा। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प बात यह है कि सूचना पहले ही दे दी गई, मानो यह कोई बहुत बड़ी पारदर्शिता हो। “देखिए, हम पहले ही बता रहे हैं कि डॉक्टर नहीं रहेंगे।” अब यह अलग बात है कि मरीजों के लिए इससे कोई समाधान नहीं निकलता ।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर किसी को आकस्मिक समय सांप काट ले, किसी महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो जाए या किसी बच्चे की तबीयत अचानक बिगड़ जाए तो वे क्या करें? क्या एंबुलेंस को भी यही संदेश भेज दिया जाए कि “थोड़ा इंतजार करिए, डॉक्टर साहब मीटिंग से लौटते ही इलाज शुरू होगा”?
दरअसल यह घटना केवल एक संदेश भर नहीं है, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की उस हकीकत की झलक है जहां अस्पताल तो है, बोर्ड भी लगा है, लेकिन कई बार डॉक्टर और सुविधाएं दोनों ही “मीटिंग” में चले जाते हैं।
अब सवाल यह है कि यदि डॉक्टर बीएमओ की मीटिंग थी तो अन्य किसी डॉक्टर को प्रभार या विभाग की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती थी l तथा
सोशल मीडिया पर इस तरह के मैसेज अधिकारी द्वारा पोस्ट किए जाने का क्या अर्थ है,,
हरिशंकर बेन


