मनुष्य का शरीर केवल मांस-हड्डियों का ढांचा नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित नगर के समान है। इस नगर की चहारदीवारी प्रज्ञा है, हड्डियाँ उसके खंभे हैं और चमड़ा वह दीवार है जो पूरे नगर को सुरक्षित रखती है। मांस और रक्त रूपी पंक का लेप इस नगर पर चढ़ा है, जो इसके भौतिक स्वरूप को दर्शाता है।
इस नगर में नौ द्वार हैं, जिनकी रक्षा अत्यंत आवश्यक मानी गई है। नस-नाड़ियाँ इस नगर को चारों ओर से घेरे हुए हैं। नगर के भीतर चेतन पुरुष राजा के रूप में विराजमान है, जिसके दो प्रमुख मंत्री हैं—बुद्धि और मन। ये दोनों मंत्री स्वभाव से परस्पर विरोधी हैं और अक्सर एक-दूसरे पर हावी होने का प्रयास करते रहते हैं।
नगर का सबसे बड़ा संकट तब उत्पन्न होता है जब राजा के चार शत्रु—काम, क्रोध, लोभ और मोह—सक्रिय हो जाते हैं। ये शत्रु सदैव राजा के विनाश की योजना में लगे रहते हैं। जब तक राजा नौ द्वारों को संयम से बंद रखता है, तब तक नगर सुरक्षित रहता है।
लेकिन जैसे ही संयम टूटता है और नगर के द्वार खुले छोड़ दिए जाते हैं, राग नामक शत्रु नेत्र आदि द्वारों पर आक्रमण कर देता है। यह शत्रु अत्यंत व्यापक और शक्तिशाली बताया गया है, जो पांच इंद्रिय रूपी द्वारों से नगर में प्रवेश करता है। इसके साथ तीन अन्य भयंकर विकार भी प्रवेश कर जाते हैं, जो मन और इंद्रियों से संबंध जोड़कर उन्हें अपने वश में कर लेते हैं।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब मन राग के अधीन हो जाता है। ऐसे में बुद्धि पराजित होकर पलायन कर जाती है। मंत्री के नष्ट होते ही नगर के अन्य पुरवासी भी साथ छोड़ देते हैं। परिणामस्वरूप शत्रुओं को नगर की कमजोरियों और छिद्रों का ज्ञान हो जाता है और अंततः राजा का नाश हो जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार राग से काम, काम से लोभ, लोभ से मोह और मोह से अविवेक जन्म लेता है। अविवेक से स्मरण-शक्ति भ्रांत हो जाती है, स्मृति के नाश से बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि के नष्ट होते ही मनुष्य अपने कर्तव्य से भ्रष्ट होकर स्वयं के पतन का कारण बन जाता है।
यह आध्यात्मिक दृष्टांत स्पष्ट संदेश देता है कि संयम, स्मरण और विवेक ही मनुष्य के वास्तविक रक्षक हैं। जब तक मनुष्य अपने इंद्रिय-द्वारों पर नियंत्रण रखता है, तब तक जीवन रूपी नगर सुरक्षित रहता है।
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विशेष आध्यात्मिक रिपोर्ट


