कटनी (24 दिसंबर) – प्रदेश के शिक्षा विभाग द्वारा व्यावसायिक शिक्षा के अंतर्गत स्नातक स्तर के विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर स्वावलंबी एवं स्वरोजगार स्थापित करने के लिए प्राचार्या डॉ सुषमा श्रीवास्तव के मार्गदर्शन एवं प्रशिक्षण समन्वयक डॉक्टर अरुण कुमार सिंह के सहयोग से जैविक कृषि विशेषज्ञ रामसुख दुबे के द्वारा जैविक खेती का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
प्रशिक्षण में भारत में खेती के प्रकार के अंतर्गत देश के विभिन्न भागों की जलवायु भूमि की उर्वरक क्षमता और भूमिका आकार भिन्न-भिन्न है। बताया गया कि खेती के पांच प्रकार हैं- विशिष्ट खेती, मिश्रित खेती, शुष्क खेती, बहुत प्रकारीयखेती एवं रैंचिंग खेती।
श्री दुबे ने बताया कि केंचुआ खाद बनाने के लिए आइसी निया फोटीडा केंचुआ 30 से 45 दिन में कचरा गोबर को खाद बना देते हैं। केंचुआ खाद में सभी पोषक तत्व पाए जाते हैं केंचुआ खाद के उपयोग से भूमि की गुणवत्ता में सुधार जलधारण क्षमता में वृद्धि एवं फसलों में कीटतथा रोग कम लगते हैंफलों, सब्जियों एवं अनाजों का उत्पादन बढ़ जाता है पौष्टिक स्वाद रंग एवं आकार अच्छा हो जाता है। प्रति एकड़ 8 से 10 क्विंटल केंचुआ खाद का उपयोग फसलों में करते हैं। केंचुआ एवं केंचुआ खाद से वार्षिक आय की जानकारी दी गई। जिससे विद्यार्थी ग्राम में रहकर ग्राम में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर स्वरोजगार स्थापित कर सकते हैं। शस्य विज्ञान कृषि के क्षेत्र में भौतिक रासायनिक जैविक ज्ञान के द्वारा लाभकारी फसल उत्पादन में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है कम खर्च के द्वारा तथा कम से कम भूमि क्षरण के साथ उपयुक्त उत्पादन लेने में सहायक होता है।


