चहनिया चन्दौली।
पूर्व प्रधानमंत्री व किसान नेता चौधरी चरण सिंह की जयन्ती मंगलवार को अमर शहीद चंदन राय पार्क मारूफपुर में धूम-धाम के साथ मनायी गयी। इस अवसर पर क्षेत्र के प्रबुद्ध विद्वतजन, किसान, शिक्षक, नौजवान सहित सैकड़ों लोग शिरकत किए और गोष्ठी में स्व0 चौधरी चरण सिंह के कृत्यों पर प्रकाश डाला।
गोष्ठी में पूर्व सपा सांसद रामकिसुन यादव ने श्री चौधरी के जीवन वृतान्त पर व्यपक चर्चा करते हुए बताया कि चौधरी चरण सिंह 23दिसंबर 1902 को उनका जन्म बाबूगढ़ छावनी के निकट नूरपुर गांव, तहसील हापुड़, जनपद गाजियाबाद, कमिश्नरी मेरठ में काली मिट्टी के अनगढ़ और फूस के छप्पर वाली मढ़ैया में एक जाट परिवार मे हुआ था। उनके पिता चौधरी मीर सिंह ने अपने नैतिक मूल्यों को विरासत में चरण सिंह को सौंपा था। चरण सिंह के जन्म के 6वर्ष बाद चौधरी मीर सिंह सपरिवार नूरपुर से जानी खुर्द के पास भूपगढी आकर बस गये थे। यहीं के परिवेश में चौधरी चरण सिंह के नन्हें ह्दय में गांव-गरीब-किसान के शोषण के खिलाफ संघर्ष का बीजारोपण हुआ। उनकी मृत्यु 29 मई 1987 को हुई। वह भारत के किसान राजनेता एवं पाँचवें तथा दुसरे गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे। उन्होंने यह पद 28जुलाई 1979से 14 जनवरी 1980तक संभाला। चौधरी चरण सिंह ने अपना संपूर्ण जीवन भारतीयता और ग्रामीण परिवेश की मर्यादा में जिया। फरवरी 2024 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा की गयी।
स्वाधीनता के समय उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। इस दौरान उन्होंने बरेली की जेल से दो डायरी रूपी किताब भी लिखी। स्वतन्त्रता के पश्चात् वह राम मनोहर लोहिया के ग्रामीण सुधार आन्दोलन में लग गए।
किसान न्याय मोर्चा प्रदेश संयोजक महेंद्र प्रसाद एडवोकेट ने कहा कि चौधरी चरण सिं की विरासत कई जगह बंटी। आज जितनी भी जनता दल परिवार की पार्टियाँ हैं, उड़ीसा में बीजू जनता दल हो या बिहार में राष्ट्रीय जनता दल हो या जनता दल यूनाएटेड ले लीजिए या ओमप्रकाश चौटाला का लोक दल, अजीत सिंह का ऱाष्ट्रीय लोक दल हो या मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी हो, ये सब चरण सिंह की विरासत हैं।
कांग्रेस के लौहर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ था, जिससे प्रभावित होकर युवा चौधरी चरण सिंह राजनीति में सक्रिय हो गए। उन्होंने गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया। 1930में जब महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया तो उन्होंने हिंडन नदी पर नमक बनाकर उनका साथ दिया। जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। वो किसानों के नेता माने जाते रहे हैं। उनके द्वारा तैयार किया गया जमींदारी उन्मूलन विधेयक राज्य के कल्याणकारी सिद्धांत पर आधारित था। एक जुलाई 1952को यूपी में उनके बदौलत जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ और गरीबों को अधिकार मिला। उन्होंने लेखापाल के पद का सृजन भी किया। किसानों के हित में उन्होंने बड़ौत से विधानसभा सदस्य पंडित उमराव दत्त शर्मा की सहायता से सन 1954में उत्तर प्रदेश भूमि संरक्षण कानून बनाया जिसे उन्होंने विभानसभा में पारित कराया। वो 3 अप्रैल 1967को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 17 अप्रैल 1968 को उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। मध्यावधि चुनाव में उन्होंने अच्छी सफलता मिली और दुबारा 17फ़रवरी 1970 तक वे मुख्यमंत्री बने। उसके बाद वो केन्द्र सरकार में गृहमंत्री बने तो उन्होंने मंडल और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। 1979में वित्त मंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की। 28जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह समाजवादी पार्टियों तथा कांग्रेस (यू) के सहयोग से प्रधानमंत्री बने। हालाँकि, चरण सिंह सरकार को जल्द ही एक बड़ा झटका लगा। इंदिरा गांधी का समर्थन उनके और संजय गांधी के खिलाफ सभी आरोपों को वापस लेने की शर्त पर था। सिंह ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, जिसके कारण कांग्रेस (आई) ने लोकसभा में बहुमत साबित करने से ठीक पहले अपना समर्थन वापस ले लिया। परिणाम स्वरूप, उन्होंने 20 अगस्त 1979 को, केवल 23दिनों के कार्यकाल के बाद, प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और संसद का सामना न करने वाले एकमात्र भारतीय प्रधानमंत्री बन गए। इस दौरान समाजवादी पार्टी पूर्व सांसद रामकिशन यादव, किसान न्याय मोर्चा प्रदेश संयोजक महेंद्र प्रसाद एडवोकेट, महामंत्री इंद्रजीत शर्मा, शमीम अहमद मिल्की, पूर्व प्रमुख हरिदास यादव, पूर्व जिला पंचायत सदस्य चंद्रमा यादव, युवा छात्र संघ जिला अध्यक्ष अमरजीत यादव, श्रवण कुमार यादव, रामाशीष यादव, विद्यासागर यादव, सहित सैकड़ो लेग मौजूद रहे।


