पत्रकारिता की कठोर ज़मीन पर तीन दशक से सच की खोज में निरंतर सक्रिय रहे वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र सिंह जादौन का काव्यसंग्रह “एक फ़ितूर” आज राजधानी भोपाल में उपमुख्यमंत्री डॉ. राजेन्द्र शुक्ल के करकमलों द्वारा विमोचित किया गया। यह विमोचन न केवल एक पुस्तक का, बल्कि एक विचार-यात्रा का उद्घाटन था जहाँ शब्दों ने समाचार की सीमाओं को लाँघकर कविता का रूप धारण किया।
“एक फ़ितूर” मात्र कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि उस पत्रकार की संवेदनशील आत्मा की दास्तान है जिसने सत्ताओं के गलियारों में सच की मशाल थामे रखी। यह संग्रह उस जिद, उस जुनून और उस फ़ितूर का दस्तावेज़ है जो एक पत्रकार के भीतर तब जन्म लेता है, जब वह खबरों के पार जाकर इंसान के भीतर झाँकने लगता है।
जादौन की कविताएँ सीधे दिल से निकलती हैं उनमें कोई आडंबर नहीं, कोई सजावट नहीं। वे जीवन की वास्तविकता से टकराती हैं, प्रेम की नमी में भीगती हैं और समाज की विडंबनाओं को उजागर करती हैं। कभी ये कविताएँ आत्ममंथन करती हैं, तो कभी सामूहिक चेतना को जगाती हैं। “एक फ़ितूर” का हर शब्द एक अनुभव है, जो पत्रकारिता के स्याही भरे संघर्ष से उपजा है।
विमोचन अवसर पर उपमुख्यमंत्री डॉ. राजेन्द्र शुक्ल ने कहा ….
“पत्रकार जब कवि बनता है तो उसकी कलम और भी प्रखर हो जाती है। ‘एक फ़ितूर’ में वही भाव है जो समाज का आईना भी है और आत्मा का स्वर भी। यह पुस्तक साबित करती है कि पत्रकारिता केवल खबर नहीं, बल्कि संवेदना का विस्तार भी है।”
कार्यक्रम में अनेक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार, और मीडिया जगत से जुड़े गणमान्यजन उपस्थित रहे। सबने “एक फ़ितूर” को एक ऐसी रचना के रूप में सराहा जो खबरों की भीड़ में भी कविता की नमी और मनुष्य की आत्मा की गूंज सुनने का अवसर देती है।
राजेन्द्र सिंह जादौन, मध्यप्रदेश की पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम हैं। “सर्च स्टोरी” समूह के संपादक के रूप में उन्होंने अपने निर्भीक, खोजी और सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेखन से हमेशा एक अलग पहचान बनाई है। वे उन पत्रकारों में से हैं जो सत्ता से प्रश्न करने का साहस रखते हैं और सच्चाई को समाज के सामने निर्भयता से रखते हैं। लगभग तीस वर्षों से वे प्रदेश के प्रशासन, राजनीति और समाज के बीच फैले सच को शब्दों में उतारते आ रहे हैं।
अब यही कलम कविता के रूप में बोल रही है कहीं पीड़ा के स्वर में, कहीं प्रेम के माधुर्य में, तो कहीं समाज की विडंबना के विद्रोह में। “एक फ़ितूर” में वह सब कुछ है जो एक संवेदनशील मन वर्षों से महसूस करता रहा शहरों की भीड़ में अकेलापन, रिश्तों में दूरी, और जीवन की अनकही जद्दोजहद।
इस संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें पत्रकारिता की तेज़ी और कविता की गहराई दोनों का सुंदर संगम है। जादौन की भाषा सीधी, सशक्त और भावनात्मक है। वे शब्दों को अलंकारों से नहीं, अनुभवों से सजाते हैं। उनका “फ़ितूर” किसी कल्पना का नहीं, बल्कि उस सच्चाई का प्रतीक है जो भीतर जलती है और बाहर उजाला करती है।
“एक फ़ितूर” केवल कविताओं का नहीं, बल्कि एक विचारशील व्यक्ति की आत्मयात्रा का दस्तावेज़ है जहाँ खबरों की स्याही अब कविता की संवेदना बनकर बहती है। यह पुस्तक बताती है कि पत्रकारिता और साहित्य विरोधी नहीं, बल्कि एक ही कलम की दो दिशाएँ हैं।
आज जब खबरें बाज़ार के दबाव में खोती जा रही हैं, ऐसे में “एक फ़ितूर” जैसे संग्रह हमें यह याद दिलाते हैं कि शब्दों की असली ताकत अभी भी सच कहने में है चाहे वह रिपोर्ट के रूप में हो या कविता के रूप में।
*“एक फ़ितूर” वह आग जो स्याही में जलती रही,अब कविता बनकर रोशनी दे रही है।”*


