डॉ. इंदु भूषण बाली
भारत का इतिहास साक्षी है कि जब-जब विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किया, देश ने अपार क्षति झेली। चाहे 1962 का चीन युद्ध रहा हो, 1965 और 1971 का पाकिस्तान युद्ध या फिर 1999 का कारगिल संघर्ष, इन सबने राष्ट्र को चोट पहुँचाई। उदहारण के रूप में हमारा पैतृक क्षेत्र छम्ब-मनावर भी 1971 के युद्ध की भेंट चढ़ चुका है। लेकिन यह भी सच है कि हमारे शूरवीर सैन्य योद्धाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर उक्त युद्धों में शत्रुओं को छठी का दूध याद दिलाया था लेकिन “राष्ट्र की आत्मा” को नहीं तोड़ने दिया। फलस्वरूप हम और अधिक दृढ़ होकर खड़े हुए, सैनिकों के शौर्य ने हमें संबल दिया। उन्हें मेरा नमन है कि उन्होंने राष्ट्र और राष्ट्रीय तिरंगे को सदैव ऊंचाइयों पर फहराया है।
परन्तु आज एक ऐसा अदृश्य संकट हमारे सामने है, जो किसी विदेशी आक्रमण से कहीं अधिक भयंकर है। यह भीमकाय संकट है “भारतीय न्याय व्यवस्था” की खोखली होती नींव। यह विडम्बना है कि जिसके कंधों पर न्याय और संविधान की रक्षा का दायित्व है, वही अपने मौलिक कर्तव्य से विमुख होता दिखाई दे रहा है बल्कि यूं कहें कि “भारतीय न्याय व्यवस्था” स्वयं को अन्याय, शोषण और न्याय की हत्या करते हुए सिद्ध कर रही है अर्थात प्रमाणित कर रही है। हालांकि छात्रों को शिक्षा देते हुए हाल ही में भारत के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री बी. आर गवई जी ने भी अपने सम्बोधन में न्यायिक सुधार पर बल दिया है। उल्लेखनीय है कि ऐसे ही कोरे भाषण और मगरमच्छी ऑंसू बहते हुए मैंने अपने जीवन के 63 वर्षों में बहुत आते और जाते देखे हैं। पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डॉ. डी.वाई.चन्द्रचूड जी को न्याय की देवी की ऑंखों से पट्टी उतारते भी देखा है। परन्तु सुधार किया किसी ने भी नहीं।
संवैधानिक मर्यादा और विधि के शासन का पतन (CONSTITUTIONAL BREAKDOWN OF THE RULE OF LAW) :-
डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान सभा में चेताया था कि संविधान चाहे कितना भी श्रेष्ठ क्यों न हो, यदि उसके संरक्षक ईमानदार न हों तो वह निष्प्रभावी हो जाएगा। आज वही दृश्य हमारे सामने है।
न्याय के संरक्षक – माननीय न्यायाधीश और सरकारी अधिवक्ता – न तो संसद द्वारा पारित कानूनों का सम्मान कर रहे हैं, न ही सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्णयों का पालन। यहां तक कि अवमानना याचिकाओं का तमाशा मैं माननीय जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय में रोज देखने को मिलता है।
संसद ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 1995 की धारा 47 और 72, तथा संशोधित दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम की धारा 20 पारित की है। इन धाराओं को नहीं मानने वालों को दण्डित करने की भी धाराएं बनाईं। लेकिन किसी को दण्ड नहीं दिया है। असल में सत्यमेव जयते का प्रकाश फैलाना इन धाराओं का मुख्य उद्देश्य यह था कि सेवा पर हुए दिव्यांग कर्मचारियों को नौकरी से निकाला न जाए, उन्हें गरिमा के साथ कार्य करने का वैकल्पिक अवसर मिले। लेकिन उसके बावजूद सच्चाई यह है कि सेवा पर हुए दिव्यॉंगजनों को माननीय न्यायाधीश न्याय मांगने पर आर्थिक दण्ड लगाकर उनकी याचिकाओं को रद्द कर रहे हैं।
विडम्बना यह है कि माननीय जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के ऐसे माननीय विद्वान न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित बाध्यकारी निर्णयों को भी नहीं मानते, जहां माननीय शीर्ष न्यायालय ने अनेक बार इन अधिकारों की पुष्टि की हुई है। उनमें कुनाल सिंह बनाम भारत संघ, रविन्द्र कुमार धारीवाल बनाम भारत संघ और लेफ्टिनेंट कर्नल सुप्रिता चंदेल बनाम भारत संघ जैसे अनेक निर्णय इसके साक्षी हैं।
उपरोक्त साक्ष्यों के अतिरिक्त भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DOPT) ने 25 फरवरी 2015 को स्पष्ट आदेश (OFFICE MEMORANDUM) जारी किया, जो कर्मचारियों के अधिकारों को और सशक्त करता है। लेकिन उसके बावजूद सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के निदेशक नहीं मानते हैं और तो और कतिपय मनोविशेषज्ञ भी पीड़ितों को मानसिक रोगी घोषित कर उनका न्यायिक उपहास उड़ाते हैं तथा न्यायमूर्ति उन पर नमक छिड़कते हैं।
लेकिन आश्चर्य यह है कि संसद का कानून, सर्वोच्च न्यायालय का आदेश और भारत सरकार की अधिसूचना की तीन ढाल को निर्दयतापूर्वक तोड़ा जा रहा है। यही त्रिस्तरीय संरक्षण (TRIPLE PROTECTION) ढाल है, जिसे तोड़कर हमारे ही संरक्षक संविधान की आत्मा को घायल ही नहीं बल्कि मृत्यु के घाट उतार रहे हैं। अर्थात अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों की संधियों पर आधारित संविधान के अन्तर्गत बनाए गए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 1995 की धारा 47 एवं संशोधित दिव्यॉंगता अधिकार अधिनियम 2016 की धारा 20 की निर्मम हत्या जानबूझकर ही नहीं बल्कि सोचे समझे षडयंत्र में कर रहे हैं और वे हत्यारे माननीय जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के माननीय विद्वान न्यायाधीश हैं।
न्याय का स्वरूप और विडम्बना :-
न्यायालयों की तुलना यदि किसी किले से की जाए, तो सशक्त किले की दीवारें बाहर से आने वाले आक्रमणकारियों से हमें सुरक्षा देती हैं। परन्तु यदि किले के भीतर बैठे हमारे रक्षक ही भक्षक बनकर विश्वासघात करने लगें, तो बाहर से आने वाले शत्रु की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। यही स्थिति आज भारत की है और भारत के सेवा पर हुए दिव्यॉंगजनों की है। क्योंकि यहॉं वर्तमान माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में उनके ही सांसदों द्वारा दोनों सदनों में पारित “संशोधित दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 की धारा 20” को उनके ही अधीनस्थ सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) जैसे विभाग मान नहीं रहे हैं और न ही जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के माननीय विद्वान न्यायाधीश मान रहे हैं। ऐसे में संविधान प्रेमी सेवा पर हुए दिव्यॉंगजन जाएं तो कहां जाएं?
इसलिए कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि विदेशी आक्रमणकारी केवल हमारी सीमाएँ तोड़ कर आगे आ पाए, जिन्हें हमारे वीर सैनिक अवश्य खदेड़ देंगे। परन्तु हमारे राष्ट्र का दुर्भाग्य यह है कि वर्तमान “भारतीय न्याय व्यवस्था” ही हमारे देश और देशवासियों की “आत्मा” को तोड़ रही है। इससे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण इतिहास किसी भी माननीय प्रधानमंत्री के सामने नहीं आया होगा, जो दुर्भाग्य माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी एवं उनके कार्यकाल में “संसद के दोनों सदनों के माननीय सांसदों” के सामने प्रकट हो रहा है। क्योंकि उनके बनाए हुए अधिनियमों की अवमानना उनके ही कार्यकाल में प्रत्यक्ष रूप से उनके ही अधीनस्थ विभाग कर रहे हैं और वह लाख चाहकर भी कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं।
उल्लेखनीय है युद्ध में सैनिक योद्धा अपना रक्त भारत माता को अर्पित कर वीरगति प्राप्त करते हैं। परन्तु न्याय के गृहयुद्ध में साधारण नागरिक अपमान, निराशा और असहायता का जीवन जीने को विवश हो रहे हैं जबकि उसी साधारण नागरिक से कर (TAX) के रूप में अर्जित करोड़ों रुपए से भारत की न्यायपालिका के माननीय मुनसिफ से लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय के माननीय विद्वान मुख्य न्यायाधीश भारीभरकम वेतन भत्ते और राजसी सुविधाऍं प्राप्त करते हैं और उन्हीं का शोषण करते हैं। वर्णननीय यह भी है इन्हीं साधारण नागरिकों से प्राप्त कर से करोड़ों रुपए खर्च कर “राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण नई दिल्ली” और प्रत्येक राज्य, केंद्र शासित प्रदेश सरकार की विधिक सेवा प्राधिकरणों ने जन्म लिया था। लेकिन वह भी उक्त संशोधित दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 की धारा 20 को लागू करवाने में पूरी तरह असफल हो रही हैं और सफेद हाथी प्रतीत नहीं हो रहीं बल्कि कबीर दास जी के उस दोहे को चरितार्थ कर रही हैं जिसमें उन्होंने स्पष्ट लिखा हुआ है कि –
बड़ा भया तो क्या भया जैसे पेड़ खजूर,
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।।
अर्थात राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण नई दिल्ली और उच्चतम न्यायालय के माननीय विद्वान मुख्य न्यायाधीश के वैधानिक संरक्षण के बावजूद न्याय पाने की राह इतनी कंटीली, कठिन, महंगी, पीड़ादायक, अपमानजनक और अंतहीन बना दी गई है कि पीड़ित व्यक्ति टूटकर रह जाता है और वह अपने अनमोल सम्पूर्ण जीवन में “सत्यमेव जयते” के प्रत्यक्ष दर्शन कभी भी नहीं कर सकता। इस सम्बन्ध में लेखक भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री बी.आर. गवई जी को सम्मान सहित चुनौती देने में गौरवान्वित अनुभव कर रहा है कि यदि उन्हें किसी भी बिंदु पर किसी भी प्रकार की कोई भी शंका लगे, तो मैं उनकी विधिक शंका को मिटाने के लिए उनके साथ सार्वभौमिक चर्चा करने के लिए सार्वजनिक मंच पर तैयार हूॅं।
नागरिकों का विश्वास और सत्ता परिवर्तन की संवैधानिक चेतावनी :-
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति नागरिकों का विश्वास होता है और उक्त विश्वासपूति का न्यायपालिका एक ओर नागरिकों को भरोसा देती है और दूसरी ओर संविधान द्वारा दिए वचन का दायित्व निभाती है। संविधान के इन्हीं वचनों एवं प्रतिज्ञाबद्ध चार स्तम्भों पर लोकतंत्र जीवित रहता है। लेकिन यदि यही भरोसा टूट गया, तो लोकतंत्र केवल नाम का रह जाएगा और नागरिकों का दुर्भाग्य यह है कि माननीय जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के कतिपय विद्वान न्यायाधीश इन वचनों और प्रतिज्ञाओं को तार तार करते हुए विश्वासघात कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि उक्त विश्वासघातों पर माननीय महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा प्रेषित शिकायत No. PRSEC/E/2025/0029913 दिनांक 13-06-2025 को भारत सरकार के विधि और न्याय मंत्रालय ने पत्रांक F. No. K-11019/14/2025-US-I/II पर माननीय जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के माननीय विद्वान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री अरूण पल्ली जी को इन हाउस जॉंच करने के लिए भेजा था। सम्भवतः वे जॉब कर भी रहे होंगे। उदाहरण स्वरुप उक्त पत्र निम्न है :-
F. No. K-11019/14/2025-US-I/II
Government of India
Ministry of Law and Justice
Department of Justice
(Appointments Division)
Jaisalmer H6u$e, 26, Man Singh Road,
New Delhi-110001, dated: 13th June, 2025
The PPS to the Chief Justice,
Jammu & Kashmir and Ladakh High Court,
Srinagar, Jammu and Kashmir 190009
To
1, Subject: Forwarding of Complaint/grievance petitions against Judges of the Jammu & Kashmir and Ladakh High Court-reg.
Sir,
The undersigned ‘ is directed to forward herewith a copy of the complaint/grievance
petitions dated 18.05.2025, which have been received from Ms. Indu Bhushan Bali, on the
above stated subject. It is requested that the said complaint/grievance petition. may be placed
before the Chief Justice of the Jammu & Kashmir and Ladakh High Court for action, as
approprIate.
2.
This issues with the approval of the Competent Authority.
Enel: As above
Yours faithfully
(Anant Kumar)
Under Secretary (Appointments-II)
Tel: 23382978
Email:anant.kumar43@gov.in
जागरूकता एवं सतर्कता आवश्यक है :-
ध्यान रहे पड़ोसी देशों में सत्ता परिवर्तन का कारण केवल आर्थिक संकट या राजनीतिक अस्थिरता नहीं रहा, बल्कि जनता का न्याय व्यवस्था से मोहभंग भी एक बड़ा कारण बना। यदि भारत में न्याय व्यवस्था ने आत्ममंथन नहीं किया, तो परिणाम भयावह हो सकते हैं जिन पर माननीय महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी, उनके सलाहकार श्री अजीत डोभाल जी, रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह जी, गृहमंत्री श्री अमित शाह जी और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ श्री अनिल चौहान जी को राष्ट्रहित में चिंतन एवं मंथन अवश्य करना चाहिए ।
व्यंग्यात्मक सच :-
आज हालत यह है कि न्यायालयों में न्याय ढूँढने जाना वैसा ही है जैसे अंधेरे में दीपक खोजने निकलना।
न्याय का तराजू संतुलन खो चुका है; वह अब शक्ति और पैसे के पलड़े में ही झुकता दिखाई देता है और उक्त झुकाव प्रमाणित भी हो चुका है। अर्थात अशक्त और साधारणजनों के लिए न्याय प्राप्त करना उतना ही दुर्लभ है जितना रेगिस्तान में पानी प्राप्त करना होता है।
राष्ट्रहित की पुकार :-
यदि हम सच में राष्ट्रभक्त हैं, तो हमें इस सबसे बड़े आंतरिक खतरे को पहचानना होगा। यह खतरा किसी सीमा पर खड़े शत्रु से नहीं, बल्कि न्यायालय की चौखट से है। जहां अपने ही सुरक्षाकर्मी अपनों को ही रोककर न्याय में बाधा डालते हैं।
न्याय व्यवस्था को चाहिए कि वह :-
1. संसद द्वारा पारित कानूनों को सर्वोपरि माने।
2. सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्णयों का अधीनस्थ न्यायालयीन संविधान के अनुच्छेद 141 और 144 का कठोरता से पालन करे तथा करवाए और माननीय उच्चतम न्यायालय के माननीय विद्वान मुख्य न्यायाधीश अपने मौलिक कर्तव्यों की निष्ठापूर्वक पूर्ति करते हुए स्वतः सॅंज्ञान लेकर आदेशों का पालन सुनिश्चित करवाए।
3. सरकारी अधिसूचनाओं को सम्मान दे।
4. नागरिकों के विश्वास को पुनः अर्जित करने के लिए पारदर्शिता और संवेदनशीलता दिखाए और रक्तरंजित भारत माता की संवैधानिक आत्मा को संजीवनी बूटी खिला कर पुनर्जीवित करे।
उपसंहार :-
भारत को विदेशी आक्रमणों से न डर था और न है। परन्तु यदि न्याय व्यवस्था का यह पतन (CONSTITUTIONAL BREAKDOWN OF THE RULE OF LAW) नहीं रुका, तो यह राष्ट्र की आत्मा पर ऐसा घाव करेगा, जो किसी भी विदेशी युद्ध अथवा पहलगाव आतंकी हमले से भी कहीं अधिक घातक एवं गहरा होगा।
विनम्र प्रार्थना :-
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी, माननीय उच्चतम न्यायालय के माननीय विद्वान मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई जी और माननीय महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी आपसे विनम्र प्रार्थना है कि संविधान द्वारा प्रदत्त भारतीय नागरिकों को एवं दिव्यांगजनों को, विशेष रूप से सेवा पर हुए दिव्यॉंगजनों को प्राप्त “त्रिस्तरीय संरक्षण” (TRIPLE PROTECTION) देकर कृतार्थ करें। क्योंकि सेवा पर हुए “दिव्यांगजनों के संरक्षण अधिनियम 1995 की धारा 47 व 2016 की धारा 20” माननीय विद्वान न्यायाधीशों को दिए गए न्यायाधीश संरक्षण अधिनियम 1985 (JUDGES PROTECTION ACT 1985) के “संरक्षण” से कहीं ऊपर हैं। चूंकि उन्होंने अपने मौलिक कर्तव्यों की निष्ठापूर्वक पूर्ति हेतु अपने शरीर का कोई भाग भारत माता की सेवा में अर्पित किया होता है जबकि न्यायाधीशों ने कड़ी सुरक्षा एवं वातानुकूलित कमरों में बैठकर सेवा की होती है और उनका कोई अंग नष्ट भी नहीं हुआ होता है। उक्त दोनों संरक्षणों में सेवा पर हुए दिव्यॉंगजनों को संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित संरक्षण, माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा बाध्यकारी निर्णयों के अन्तर्गत संरक्षण और डीओपीटी द्वारा प्रशासनिक दिशानिर्देशों द्वारा दिया गया संरक्षण अर्थात त्रिस्तरीय आरक्षण (TRIPLE PROTECTION) न्यायाधीशों को दिए गए संरक्षण से कहीं अधिक संरक्षित एवं मानवीय है।
अतः राष्ट्र के निरन्तर विकास, प्रगति, वृद्धि और उन्नति को सुरक्षित और सुनिश्चित करने हेतु “संविधान की आत्मा” का पुनर्जीवित होना आवश्यक ही नहीं बल्कि परम अनिवार्य है। सम्माननीयों जय हिन्द
प्रार्थी
डॉ. इंदु भूषण बाली
प्रेस कोर कॉउन्सिल का
राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय सॅंरक्षक,
राष्ट्रपति पद का पूर्व प्रत्याशी, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार, डाकघर एवं तहसील ज्यौड़ियॉं, जिला (जम्मू) जम्मू और कश्मीर पिनकोड 181202
मोबाइल 7889843859
ईमेल आईडी baliindubhushan@gmail.com


