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Home Uncategorized

तानसेन की धुन और अहंकार से परे सृजन: कर्म, साधना और संगीत की अजर-अमर यात्रा

by Manish Gautam Chiefeditor
September 19, 2025
in Uncategorized
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तानसेन की धुन और अहंकार से परे सृजन: कर्म, साधना और संगीत की अजर-अमर यात्रा
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डॉ. इंदु भूषण बाली

सृजन और कला केवल शब्दों, धुनों या भावों का मिश्रण नहीं होती, बल्कि यह आत्मा की गहन साधना का प्रतीक होती है। जैसा कि महान संगीतज्ञ तानसेन ने अपने जीवन में दिखाया, असली संगीत केवल स्वर और ताल का संयोजन नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास, निष्ठा, कर्म और साधना का परिणाम होता है। तानसेन की धुनें आज सदियों बाद भी गूंजती हैं क्योंकि उन्होंने अपनी कला को अहंकार या स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि अपने कर्म और साधना के मार्ग पर आधारित किया। यही वह संदेश है जो हर सृजनकर्ता को समझना चाहिए कि रेडियो स्टेशन, दूरदर्शन, कल्चरल अकादमी, साहित्य अकादमी अथवा संगीत अकादमी से परे भी साहित्य पनपता है और उन्हें मात्र 1350 रुपए के मानदेय से भी कोई औचित्य नहीं होता है।

कई बार हम देखते हैं कि सुरीली आवाज़ें, अद्भुत धुनें या प्रभावशाली रचनाएँ केवल प्रतिष्ठा और मान्यता पाने के साधन बन जाती हैं। लेकिन यह वास्तविक साधना नहीं है। साधना का अर्थ है अपने कर्मों और रचनात्मक प्रयासों में निष्ठा रखना, अपने कर्तव्यों का पालन करना और समाज तथा संस्कृति के प्रति ईमानदार रहना। यदि कला में यह तत्व न हो, तो वह केवल भ्रम, छल और क्षणिक प्रशंसा का माध्यम बन जाती है। ऐसे साधक कल्चरल अकादमी के के एल सहगल हाल में बैठे देखे जा सकते हैं जिनके भेदभाव भी किसी से छुपे हुए नहीं हैं।

वर्णननीय है कि अहंकार का पोषण केवल उन लोगों में होता है, जो अपनी क्षमताओं को दूसरों से श्रेष्ठ समझते हैं और दूसरों के योगदान का अपमान करते हैं। यह न केवल व्यक्तिगत स्तर पर कलाकार की आत्मा को हानि पहुँचाता है, बल्कि समाज और संस्कृति की मूलभूत मूल्यनिष्ठा को भी हिला देता है। तानसेन की महानता केवल उसकी धुनों में नहीं थी, बल्कि उसकी कर्मठता, साधना और अनुशासन में थी। उन्होंने संगीत को केवल प्रदर्शन का साधन नहीं, बल्कि आत्मा की साधना का माध्यम बनाया।

सच्ची कला का आधार अहंकार नहीं, बल्कि कर्म और निष्ठा है। वह केवल तभी जीवित रहती है जब रचनाकार अपने कर्तव्यों और मौलिक कर्तव्यों का पालन करता है। हमारे कर्म, हमारे प्रयास और हमारी नैतिकता ही हमें सच्ची संतुष्टि और मोक्ष की ओर ले जाते हैं। यदि कोई अपनी रचनाओं में केवल दिखावा, छल या भ्रष्ट माध्यमों का सहारा लेता है, तो वह केवल क्षणिक प्रशंसा का अनुभव कर सकता है, लेकिन उसे सृजन का वास्तविक आनंद और आत्मिक संतोष कभी नहीं मिलेगा। क्योंकि चापलूस व्यक्तित्व प्रायः क्षणिक होता है। वह न तो राष्ट्रनिर्माण में सहायक होता है न ही कभी स्वयं संतुष्ट होता है।

जीवन और कला में यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है कि केवल प्रतिभा या सुरीली ध्वनि का होना पर्याप्त नहीं है। यदि यह प्रतिभा निष्ठा और ईमानदारी के मार्ग पर आधारित नहीं है, तो यह केवल क्षणभंगुर चमक बनकर रह जाती है। सच्चा कलाकार वही है, जो अपने कर्मों में ईमानदार, अपने कर्तव्यों में निष्ठावान और अपनी रचनाओं में साधना और आत्मिक अनुशासन को प्राथमिकता देता है। किसी साहित्यकार की पुस्तकों का अनादर नहीं करता है। क्योंकि ग़ज़ल सजल हो सकती लेकिन आनन्द किसी बंधन का मोहताज नहीं होता है।

हमारा कर्म ही हमारी असली पहचान है। हमारे द्वारा किए गए कार्य, हमारे द्वारा रचित रचनाएँ और हमारी नैतिकता ही हमें जीवन में मूल्य और मोक्ष प्रदान करते हैं। दुनिया चाहे हमारे प्रयासों को पहचाने या न पहचाने, पर सृजन और साधना की शुद्धता कभी लुप्त नहीं होती। यह शुद्धता ही हमें जीवन में स्थायी आनंद और आत्मिक शांति देती है।

अंततः, सृजन और कला का असली आनंद अहंकार से परे, कर्म और साधना के मार्ग पर चलकर ही अनुभव किया जा सकता है। तानसेन की तरह, हमें भी अपने भीतर चिंतन और मंथन करना चाहिए, अपने कर्मों और रचनाओं की शुद्धता पर ध्यान देना चाहिए। यही मार्ग हमें सच्चे कलाकार, सच्चे साधक और सच्चे मानव बनाता है।

सृजन का मार्ग, साधना का मार्ग और कर्म का मार्ग अंततः एक ही लक्ष्य की ओर ले जाता है – निष्ठा, शुद्धता और आत्मिक उन्नति। और यही हमें सिखाता है कि किसी भी शक्ति, प्रतिभा या उपलब्धि पर अहंकार नहीं करना चाहिए। प्रत्येक रचना, प्रत्येक धुन और प्रत्येक प्रयास केवल तभी मूल्यवान होता है जब वह ईमानदारी, साधना और कर्म के साथ जुड़ा हो।

आज जब हम तानसेन की धुनों को सुनते हैं, हमें केवल संगीत का आनंद नहीं मिलता, बल्कि यह भी स्मरण होता है कि कला और साधना की शुद्धता ही जीवन में स्थायी मूल्य और पहचान देती है। यह संदेश हमें प्रेरित करता है कि हमारी रचनाएँ और कर्म अहंकार से परे, निष्ठा और साधना से परिपूर्ण हों। यही मार्ग हमें जीवन में स्थायी सफलता, शांति और मोक्ष की ओर ले जाता है। सम्माननीयों जय हिन्द

प्रार्थी
डॉ. इंदु भूषण बाली
प्रेस कोर कॉउन्सिल का
राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय सॅंरक्षक,
राष्ट्रपति पद का पूर्व प्रत्याशी, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार, डाकघर एवं तहसील ज्यौड़ियॉं, जिला (जम्मू) जम्मू और कश्मीर पिनकोड 181202
मोबाइल 7889843859
ईमेल आईडी baliindubhushan@gmail.com

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