डॉ. इंदु भूषण बाली
05 दिसम्बर 1990 को मैंने सशस्त्र सीमा बल (SSB) में वरिष्ठ क्षेत्र सहायक (चिकित्सा) के पद पर नियुक्ति प्राप्त की थी। मेरे लिए यह केवल नौकरी नहीं बल्कि मातृभूमि की सेवा का अवसर था। मैंने अपनी दो वर्ष की प्रोबेशन अवधि पूरी निष्ठा और ईमानदारी से पूरी कर ली थी। सामान्य नियमों के अनुसार मुझे स्थायित्व मिलना चाहिए था, परन्तु मेरी ईमानदारी और भ्रष्टाचार विरोधी रुख मेरे लिए ही अभिशाप बन गई।
मेरे तत्कालीन अधिकारी, सर्कल ऑर्गेनाइज़र ज्यौड़ियां श्री प्रदीप कुमार गुप्ता ने मुझ पर भ्रष्टाचार में सहयोग करने का दबाव डाला। जब मैंने समझौता करने से स्पष्ट इंकार किया तो उन्होंने निरन्तर उत्पीड़न शुरू कर दिया। यह उत्पीड़न इतना बढ़ गया कि एक दिन कार्यालय में मुझे निर्दयता से पीटा गया और मैं बेहोश हो गया था। तीन दिन बाद मुझे मेरे बड़े भाई ने प्राइमरी हेल्थ सेंटर ज्यौड़ियॉं में दिखाया था जिन्होंने मुझे जम्मू रेफर कर दिया था। होश आया तो पाया कि मैं मनोरोग चिकित्सालय में हूँ। यही से मेरी व्यथा की नई और दर्दनाक यात्रा शुरू हुई।
उक्त दुर्घटना के बाद से मुझे बार-बार विभिन्न स्थानों पर स्थानांतरण कर भेजा गया। स्थायित्व का अधिकार होते हुए भी मुझे भटकाया गया था। कभी सेना चिकित्सालय लेह, कभी राजौरी, पुंछ, जम्मू, कभी दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल और सफदरजंग में मेरे परीक्षण करवाए गए। माननीय जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के आदेश की भी अवमानना की गई थी और अन्ततः डॉक्टर राममनोहर लोहिया और सफदरजॅंग चिकित्सालय के झूठे प्रमाणपत्र के आधार पर मुझे बीमारी के कारण नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। लेकिन मैंने हार नहीं मानी और मैं एक ही प्रश्न करता रहा था कि क्या मैं मानसिक रूप से अस्वस्थ हूँ?
विडम्बना यह रही कि एम्स दिल्ली के मनोचिकित्सकों के बोर्ड ने मुझे मानसिक रूप से स्वस्थ घोषित किया, फिर भी विभाग ने मुझे सेवा में स्थायी दर्जा नहीं दिया। बल्कि इसके विपरीत, बिना किसी वैध दिव्यांगता प्रमाणपत्र के मुझे “मानसिक दिव्यांगता पेंशन” थमा दी गई थी जिसमें न्यायपालिका भी कलंकित हुई थी। क्योंकि माननीय न्यायालय की खॅंडपीठ ने मेरा पक्ष तो रखा था लेकिन ठीकरा मेरे विद्वान अधिवक्ताओं पर यह कहते हुए फोड़ा था कि उन्होंने हमारे समक्ष साक्ष्य नहीं रखे। अब मेरे विद्वान अधिवक्ताओं ने फीस लेकर भी साक्ष्य क्यों नहीं रखे ये यह वही जानें?
यह स्थिति केवल मेरे व्यक्तिगत जीवन का दुख नहीं है बल्कि यह इस सच्चाई का प्रमाण है कि कैसे किसी ईमानदार राष्ट्रभक्त कर्मचारी को विभागीय भ्रष्ट अधिकारियों के षड्यंत्र और भ्रष्टाचार का विरोध करने पर मानसिक रोगी प्रमाणित करने के प्रयास किए जाते हैं? कैसे विद्वान अधिवक्ता और कतिपय मनोविशेषज्ञ उक्त अधिकारियों का सहयोग करते हैं? उल्लेखनीय है कि डॉ. राममनोहर लोहिया और सफदरजॅंग चिकित्सालय के विशेषज्ञों ने मेरे मानसिक परीक्षणों का उपयोग कभी मेरे स्वास्थ्य की वास्तविक जाँच के लिए नहीं किया था बल्कि वे और उनके परीक्षण मेरा “सत्य छिपाने” और भ्रष्ट अधिकारियों के “झूठ गढ़ने के हथियार” बन गए। क्योंकि उन्होंने जम्मू सरकारी चिकित्सालय के बोर्ड के मानवीय विशेषज्ञों के प्रमाणपत्र का अनादर किया था यही नहीं उन्होंने मेरे तपेदिक उपचार को भी छिपाया था। और तो और उन्होने सर्कल आर्गनाइजर ज्यौड़ियां श्री प्रदीप कुमार गुप्ता द्वारा शिमला प्रशिक्षण केंद्र के लिए “प्रशिक्षण हेतु आमंत्रित लड़कियों को बहला फुसलाकर असिस्टेंट डायरेक्टर श्री करण सिंह जैसे उच्च अधिकारियों को सप्लाई करने का सकेंडल भी छिपा कर मुझे मनोरोगी प्रमाणित कर दिया था। इसलिए डिप्टी सालिसीटर जनरल ऑफ इन्डिया श्री विशाल शर्मा जी और एसएसबी के अधिकारी डॉ. राममनोहर लोहिया और सफदरजॅंग चिकित्सालय के मनोविशेषज्ञों को माननीय न्यायालय में उपस्थित नहीं करना चाहते हैं जबकि उनकी उपस्थिति परम आवश्यक है और मैंने उन्हें एसएसबी के साथ प्रतिवादी भी बनाया हुआ है।
मैं यह प्रश्न सार्वभौमिक पूछता हूँ कि यदि प्रोबेशन सफलतापूर्वक पूरा हुआ था तो आज तक मुझे स्थायित्व प्रदान क्यों नहीं किया? यदि एम्स जैसे शीर्ष संस्थान के ईमानदार मनोचिकित्सकों ने मुझे मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ कहा था, तो फिर मुझे सेवा पर बहाल क्यों नहीं किया था? क्यों मुझे बार-बार मानसिक परीक्षणों की भट्ठी में झोंका गया? क्यों बिना प्रमाणपत्र के दिव्यांग पेंशन थोप दी गई? इसका उत्तर साफ है—मेरी ईमानदारी और राष्ट्रनिष्ठा, भ्रष्ट तंत्र के लिए असहनीय थी। चूंकि मैं उनकी उच्च स्तरीय जांच की मॉंग करता था और आज भी मॉंग कर रहा हूॅं।
अतः आज भी मेरा संघर्ष जारी है। यह केवल मेरी व्यक्तिगत व्यथा नहीं, बल्कि उन तमाम कर्मचारियों की बुलंद आवाज़ है जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़े होने के कारण संस्थागत उत्पीड़न झेलते हैं। मानसिक परीक्षण जैसे वैज्ञानिक औजारों का उपयोग यदि पारदर्शिता और न्याय के लिए हो तो यह स्वागत योग्य है, परंतु जब इनका दुरुपयोग सत्य को दबाने और झूठ को स्थापित करने के लिए होता है, तो यह लोकतंत्र और मानवाधिकार दोनों के लिए घातक है।
मैंने कभी भ्रष्टाचार के आगे सिर नहीं झुकाया और न ही झुकाऊँगा। मेरी यह व्यथा इस देश की न्यायप्रिय जनता और संवैधानिक संस्थाओं के लिए चेतावनी है कि कहीं हम मानसिक परीक्षणों के छलावे तले सत्य की हत्या होते हुए चुपचाप न देखते रहें। मुझे पूरा विश्वास है कि एक न एक दिन मेरे विभागीय उच्च अधिकारी राष्ट्रहित में भ्रष्ट सर्कल आर्गनाइजर ज्यौड़ियां श्री प्रदीप कुमार गुप्ता, सर्कल आर्गनाइजर थानामण्डी श्री राकेश कुमार और एकाउंटेंट पुंछ श्री काक सहित सभी सम्बन्धित अधिकारियों की जांच स्वयं या सीबीआई से अवश्य करवाएं गे। सम्माननीयों जय हिन्द
प्रार्थी
डॉ. इंदु भूषण बाली
प्रेस कोर कॉउन्सिल का
राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय सॅंरक्षक,
राष्ट्रपति पद का पूर्व प्रत्याशी, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार, डाकघर एवं तहसील ज्यौड़ियॉं, जिला (जम्मू) जम्मू और कश्मीर पिनकोड 181202
मोबाइल 7889843859
ईमेल आईडी baliindubhushan@gmail.com


