डॉ. इंदु भूषण बाली
समाज और राष्ट्र का भविष्य प्रायः उसकी न्यायिक, सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर निर्भर करता है। जब यह व्यवस्था नागरिकों को न्याय देने में असफल हो जाती है, तब यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक हो जाता है कि क्या अब भी पुरानी सोच और ढाँचों पर निर्भर रहा जाए या नए सिरे से चिंतन, मंथन और पुनर्गठन किया जाए।
अब समय आ गया है कि हम पुनर्विचार और पुनर्गठन करें अर्थात “High time to rethink and rewire” का अर्थ यही है कि अब और देर नहीं की जा सकती। यह वह निर्णायक क्षण है जब हमें अपनी व्यवस्था, सोच और कार्यप्रणाली को पुनः जांचने, परखने और सुधारने की आवश्यकता है।
1. न्यायपालिका और नागरिक का विश्वास :-
न्यायपालिका किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा होती है। लेकिन जब एक नागरिक न्याय की तलाश में वर्षों तक दर-दर भटकता है, और उसे केवल अस्वीकृति, उपेक्षा या दंड मिलता है, तब यह सोचना ही पड़ेगा कि व्यवस्था में कहाँ कमी रह गई है? यदि न्यायालय के आदेश पीड़ित के पक्ष में न होकर शोषण करने वाले के पक्ष में चले जाएँ, तो नागरिक का विश्वास डगमगा जाता है। उदाहरणार्थ भारत की शीर्ष न्यायालय द्वारा पारित कुनाल सिंह वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया के बाध्यकारी निर्णय को माननीय जम्मू और कश्मीर और लद्दाख के माननीय विद्वान कनिष्ठ न्यायाधीशों से लेकर मुख्य न्यायाधीश तक नहीं मानना और डंके की चोट पर सेवा पर हुए दिव्यॉंग कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लॅंघन करना है उनके द्वारा उक्त कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का संविधान के अनुच्छेद 12, 13, 14, 16, 19, 21, 23, 32, 141 और 144 का जानबूझकर अपमान करना है। ऐसे में प्रश्न स्वाभाविक है कि माननीय संसद के दोनों सदनों के सम्मानित सदस्य देश और देशवासियों के लिए क्या कर रहे हैं?
2. मौलिक अधिकार बनाम मौलिक कर्तव्य
संविधान ने हमें अधिकार भी दिए हैं और कर्तव्य भी। किंतु वास्तविकता यह है कि आम नागरिक को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ता है। यह स्थिति बताती है कि अब अधिकार और कर्तव्य की समझ को पुनर्विचार (rethink) और पुनर्गठन (rewire) की दिशा में ले जाने की परम आवश्यकता है।
3. झूठ की राजनीति” और “सत्य का संघर्ष :-
आज व्यवस्था में झूठे आरोप, फर्जी रिपोर्टें और विभागीय पक्षपात आम हो चुके हैं। जो व्यक्ति सत्य के लिए खड़ा होता है, राष्ट्रनिर्माण की बात करता है, वही प्रताड़ना झेलता है और उसे संवैधानिक मनोरोगी सिद्ध कर दिया जाता है। यहॉं तक कि राष्ट्रभक्त कर्मचारीयों को राष्ट्रद्रोह का झूठा आरोप लगाकर माननीय न्यायालय में सुरक्षा विपत्ति (SECURITY RISK) प्रमाणित कर दिया जाता है और आरोपी को आरोप मुक्त होने में उसका अनमोल जीवन बीत जाता है। यह परिदृश्य हमें चेतावनी देता है कि केवल सतही सुधार से कुछ नहीं होगा, बल्कि पूरे ढाँचे को नए दृष्टिकोण से जोड़ने की आवश्यकता है। ताकि संविधान की सर्वोच्चता बनी रहे और कभी भी विधि के शासन (RULE OF LAW) को तोड़ कर (CONSTITUTIONAL BREAKDOWN OF THE RULE OF LAW) अर्थात संविधान और विधि व्यवस्था के टूटने की स्थिति न बन पाए।
4. दिव्यांगजन अधिकार और अर्धसैनिक बलों का संकट :-
इस संदर्भ में हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री बी.आर. गवई जी, सदन के दोनों सदनों के माननीय सदस्य, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के मुख्य संरक्षक तथा नीति आयोग को गंभीर मंथन करना चाहिए कि:
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, जिस पर करोड़ों रुपए खर्च हुए और जिसे बार-बार संशोधित कर लागू किया गया, वह धरातल पर क्यों लागू नहीं हो रहा है?
अर्धसैनिक बलों (SSB, CRPF, BSF आदि) के जवान, जो सेवा में रहते हुए दिव्यांग हो जाते हैं, उन्हें सेवा से जबरन बर्खास्त क्यों किया जा रहा है?
डीओपीटी का कार्यालय ज्ञापन दिनांक 25 फरवरी 2015 क्या केवल कागज़ों में ही सीमित क्यों है?
भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ जी द्वारा पारित रविन्द्र कुमार धारीवाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और न्यायमूर्ति बी.आर. गवई जी द्वारा पारित लेफ्टिनेंट कर्नल सुप्रिता चन्देल बनाम भारत संघ के बाध्यकारी निर्णयों को उच्च न्यायालय के कनिष्ठ न्यायाधीश से लेकर मुख्य न्यायाधीश तक क्यों नहीं मान रहे हैं?
क्या अर्धसैनिक बलों के अधिकारी सर्वोच्च न्यायालय और संविधान को ठेंगा दिखा रहे हैं? क्या वह सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर हैं?
यह स्थिति संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा रचित संविधान के अनुच्छेद 12, 13, 14, 16, 19, 21, 23, 141 और 144 पर मात्र प्रश्नचिन्ह ही नहीं बल्कि उनका खुला अपमान है और विडम्बना यह है कि उक्त संवैधानिक अपमान माननीय उच्चतम न्यायालय के वर्तमान विद्वान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री बी. आर गवई जी कैसे सहन कर रहे हैं? सत्यमेव जयते की संवैधानिक वचनबद्धता के बावजूद श्री बी आर गवई जी, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी और संविधान संरक्षक माननीय महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी की छत्रछाया में नागरिकों के मौलिक अधिकारों को बलपूर्वक कुचलने का साहस क्यों किया जा रहा है? उनकी उपस्थिति में राष्ट्र के प्रति सेवाभाव में हुए दिव्यॉंग कर्मचारियों का ऐसा दुर्भाग्य क्यों है। जबकि वे देश के संविधान, संसद के दोनों सदनों के सम्मानित सदस्यों और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के मुख्य संरक्षक के “संरक्षण” में हैं। नीति आयोग के आयुक्त उत्तर दें कि ऐसा अनर्थ क्यों हो रहा है?
5. शोध और वर्तमान पीढ़ी का दायित्व :-
आज यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जब ऐसे गम्भीर विषयों पर शोधार्थियों को शोध नहीं करवाया जाता, तो क्या यह नागरिकों के धन का दुरुपयोग नहीं है? जब जनजीवन से जुड़ी सबसे ज्वलंत समस्याएँ ही शोध और विमर्श का हिस्सा न बनें, तो शिक्षा और शोध की दिशा किस ओर ले जाई जा रही है? यह केवल विचारणीय ही नहीं, बल्कि गहन मंथनीय भी है।
निष्कर्ष
अब समय आ गया है कि हम पुनर्विचार और पुनर्गठन करें कि यदि हम अभी भी टालते रहे, तो यह केवल एक व्यक्ति या एक वर्ग की समस्या नहीं रहेगी, बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए संकट बन जाएगी। हमें पुरानी जड़ता से बाहर निकलकर, नए विचार और नए ढाँचे गढ़ने होंगे ताकि हर नागरिक को उसका सम्मान और अधिकार मिल सके और कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित कर संविधान निर्माताओं का स्वप्न साकार किया जाए।
अन्यथा संत कबीरदास जी का निम्न प्रसिद्ध दोहा इन पर पूरी तरह चरितार्थ हो जाएगा कि :-
“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।”
सम्माननीयों जय हिन्द
प्रार्थी
डॉ. इंदु भूषण बाली
प्रेस कोर कॉउन्सिल का
राष्ट्रभक्त राष्ट्रीय सॅंरक्षक,
राष्ट्रपति पद का पूर्व प्रत्याशी, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार, डाकघर एवं तहसील ज्यौड़ियॉं, जिला (जम्मू) जम्मू और कश्मीर पिनकोड 181202
मोबाइल 7889843859
ईमेल आईडी baliindubhushan@gmail.com


