कालापीपल(बबलू जायसवाल)
राम मंदिर में चल रही भागवत कथा में पंडित सच्चिदानंद जी शर्मा ने कहा कि ईश्वर ने हमको मनुष्य जन्म,चार पुरुषार्थ धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष प्राप्ति के लिए दिया है,लेकिन हम माया के वशीभूत होकर केवल धनोपार्जन के पीछे भाग रहे हैं।
दो वक्त की रोटी की व्यवस्था कर,सोना,खाना और वंश वृद्धि तो पशु भी करते है,इसलिए मनुष्य होकर हमकों भक्तियुक्त कर्म करते हुए मोक्ष प्राप्ति की ओर बढ़ना चाहिये,
धन की तीन गति है
दान,भोग और नाश।
इसीलिए सभी को आय का दशांश दान करने का लाभ बताया गया है,श्री शर्मा ने बताया कि समुद्र मंथन से जो हलाहल विष निकलता है भगवान शंकर उसे अपने कंठ में धारण करते है जिसके कारण भोलेनाथ नीलकंठ कहलाये,और विष की उष्णता के कारण ही भगवान को जल की धार,धतूरा चढ़ाया जाता है,भगवान शंकर ने संसार के कल्याण के लिए विष धारण किया था,लेकिन उनकी भक्ति के नाम पर जो लोग किसी भी प्रकार का व्यसन करते है वह उचित नही है,हमारी संस्कृति सदैव व्यसन मुक्त रही है,यदि हम भोलेनाथ के सच्चे भक्त है तो उनके जैसी साधना करना चाहिए ना कि कोई भी नशा,डॉ श्री शर्मा ने पृथु जी महाराज एवं जड़भरत की कथा,एवं प्रह्लाद जी की कथा का विस्तार करते हुए बताया कि पाप के बाद कोई व्यक्ति यदि नरकगामी हो, तब उसके लिए श्रीमद् भागवत में श्रेष्ठ उपाय प्रायश्चित बताया है। अजामिल उपाख्यान के माध्यम से इस बात को विस्तार से समझाया गया,प्रह्लाद चरित्र में कहा कि भगवान नृसिंह रुप में लोहे के खंभे को फाड़कर प्रगट होना बताता है कि प्रह्लाद को विश्वास था कि मेरे भगवान इस लोहे के खंभे में भी है और उस विश्वास को पूर्ण करने के लिए भगवान उसी में से प्रकट हुए एवं हिरण्यकश्यप का वध कर प्रह्लाद के प्राणों की रक्षा की।


