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Home मध्यप्रदेश कटनी

फसल अवशेष प्रबंधन का प्रशिक्षण विद्यार्थियों को दिया गया।

by Manish Gautam Chiefeditor
March 2, 2025
in कटनी
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फसल अवशेष प्रबंधन का प्रशिक्षण विद्यार्थियों को दिया गया।
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कटनी। स्वामी विवेकानंद शासकीय महाविद्यालय स्लीमनाबाद में विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर स्वावलंबी एवं स्वरोजगार स्थापित करने के लिए स्नातक स्तर के विद्यार्थियों को मध्य प्रदेश शासन उच्च शिक्षा विभाग द्वारा व्यावसायिक शिक्षा के अंतर्गत जैविक खेती का प्रशिक्षण जैविक कृषि विशेषज्ञ रामसुख दुबे द्वारा दिया गया। यह प्रशिक्षण प्रचार्या डॉ सरिता पांडे के मार्गदर्शन एवं प्रशिक्षण समन्वयक डॉ प्रीति नेगी के सहयोग से दिया जा रहा है। फसल अवशेष प्रबंधन के अंतर्गत जानकारी दी गई कि विभिन्न फसलों की कटाई के बाद विभिन्न फसलों की कटाई के बाद बचे हुए डंठल तथा गहाई के बाद बचे हुए पुआल भूसा डंठल तथा जमीन पर पड़ी हुई पत्तियों आदि को फसल अवशेष कहा जाता है। फसल अवशेष जलाने के कारण मृदा के तापमान में वृद्धि मृदा सतह कठोर मृदा की जलधारण क्षमता में कमी एवं रासायनिक गुणों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है लाभदायक मित्र कीट एवं सूक्ष्मजीवों की संख्या में गिरावट आती है मुख्य पोषक तत्व नाइट्रोजन फास्फोरस एवं पोटाश की उपलब्धता में कमी हो जाती है मृदा क्षरण के कारण पोषक तत्वों से भरपूर मृदा की ऊपरी सतह प्रभावित होने से भूमि की उर्वरा शक्ति घट जाती है। फसल अवशेष जलाने से वायु प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है मनुष्यों में श्वास से संबंधित बीमारी अस्थमा फेफड़ों से संबंधित बीमारी तथा कैंसर एवं पराली जलाने से पर्यावरण मेंकार्बन मोनोऑक्साइड सल्फर डाइऑक्साइड नाइट्रोजन ऑक्साइड एवं अन्य हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होने के कारण आंखों में जलन रहती है इस दौरान चर्म रोग की शिकायत भी बढ़ जाती है। यह वैश्विक ताप ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाता है फसल अवशिष्ट प्रबंधन के अंतर्गत फसल कटाई के पश्चात रोटावेटर से जुटाई करके पानी लगा देने से फसल अवशेष मिट्टी में गल जाते हैं जिससे खाद बनती है गेहूं की कटाई के बाद जीरो टिलेज मशीन या हैप्पी सीडर से मूंग ढेंचा की बुवाई करके तथा धान की कटाई के बाद गेहूं की जीरो टिलेज तकनीक से बुवाई करके फसल अवशेष प्रबंधन किया जा सकता है फसल अवशेषों को पलवार। मल्च के रूप में विभिन्न फसलों में प्रयोग करके खरपतवार नियंत्रण मृदा की जलधारणक्षमता में वृद्धि मिट्टी के कटाव में कमी तथा भूमि की उर्वरक शक्ति में सुधार के लिए उपयोग किया जाता है।

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