रिपोर्टर सीमा कैथवास
नर्मदापुरम। स्थानीय सरस्वती शिशु विद्या मंदिर, नर्मदापुरम में भारतीय ज्ञान परंपरा में नदी और समाज विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और परिचर्चा का आयोजन नदी मित्र, नर्मदापुरम ईकाई के द्वारा की गई। परिचर्चा में प्रमुख वक्ता के रूप में नदी विशेषज्ञ तथा फिजी में भारत के पूर्व सांस्कृतिक राजनायिक प्रो. ओम प्रकाश भारती ने विचार रखते हुए कहा कि किनारों को मयार्दाओं को तोड़ना नदियों का शास्त्रसम्मत आचरण है। भूगोल भी यहीं कहता है। नदियाँ उफनती है, बाढ़ लाती है। भारतीय ज्ञान परंपरा में बाढ़ वृद्धि और समृद्धि का प्रतीक रही है। ज्ञान और धन को बाढ़ सामाजिक अपेक्षाएँ रहीं हैं। तो नदियों को बाढ़ की उपेक्षा क्यों।नदियाँ उपेक्षित हुई। नदी आधारित पशुपालन और कृषि व्यवस्था से लोग दूर होते गए। नदियों को बांधा गया। रोड तथा रेल लाइन बनाने के क्रम में नदियों का मार्ग अवरुद्ध हुआ। जिस बाढ़ के कारण जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ती थी और अच्छी फसलें होती थी, अब वह विनाशकारी है। उत्तर बिहार की जीवनदायिनी नदियाँ और अच्छी वर्षा लोगों के लिए वरदान था। डॉ ओम प्रकाश भारती ने नदी, समाज व सरकार विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि भारत की नदियां पूजनीय व देवी-देवताओं की श्रेणी में आती है. उन्होंने कहा कि राजाओं के समय में नदियां समाज की थी और अब सरकार की है. सरकार ने नदियों पर बांध बनाया, नहरे निकाले और पनबिजली घर बनाया, जिससे नदियों का प्राकृतिक बहाव अवरुद्ध हुआ और नदियों को प्राकृतिक दायित्व निभाने से रोका गया. नदी व पानी तो प्रकृति से प्राप्त है और इस पर समाज का अधिकार होना चाहिये, समय में स्वच्छ जल की उपलब्धता सरकार व समाज की सबसे बड़ी चुनौती है । सामाजिक समस्याओं के निदान का दायित्व राजतंत्र, गणतंत्र के अधिपत्य नहीं है, लेकिन समय के साथ सामाजिक दायित्व बोध घटता गया और जीवन देने वाली नदियों को उपेक्षित बना दिया गया. आज भिन्न- भिन्न प्रकार के सरकारी योजनाओं के माध्यम से नदियों पर इस प्रकार आघात किया गया है कि आज भारत में चार सौ से अधिक नदियां लुप्त होने के कगार पर है। साथ ही आने वाले समय में जल संकट गहरायेगा ।हमें नदी आधारित विकास के मॉडल को प्रोत्साहित करना होगा, नदियों से जुड़े समृद्ध सामाजिक ज्ञान कोष को पुनजीवित करना पड़ेगा, तभी जाकर के हमारी नदियां, हमारे समाज के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन कर पायेंगे और जल पर हमारा अधिकार होगा. भारत में वर्तमान कानून के तहत भूमि के मालिक को जल का भी मालिकाना हक दिया जाता है. जबकि भूमिगत जल साझा संसाधन है। बोरवेल ध्पंप से धरती के गर्भ से अंधाधुंध जल खींया जा रहा है, इसके से लिए वास कानून और नीति बनने चाहिए। हमें चाहिए सरकार द्वारा केच द रेन योजना का अनुकरण कर अधिक से अधिक वर्षा जल को एकत्र करें और धरती के नीचे भेजे। राजनैतिक एवं प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी, प्राथमिकताएँ,जनता की उदासीनता उससे भी ऊपर, समाज अपने दायित्व से पलायन कर रहा है। जल के उपयोग तथा भूजल की रिचार्जिंग पर समुचित ध्यान देना होगा। झील, तालाबों, नदियों और अन्य जल संसाधनों पर समाज का सामूहिक अधिकार होना चाहिए। इनके निजीकरण पर रोक लगनी चाहिए। स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालय तक के पाठ्यक्रम में जल संरक्षण तथा प्रबंधन जैसे विषय को शामिल किए जाने चाहिए। नदियों और नालों पर चीक डैम बनाए जाए, खेतों में वर्षा पानी को संग्रहीत किया जाए। खेती में उन फसलों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए,
जिनके उत्पादन में कम पानी की आवश्यकता होती है। वर्षा के जल को संग्रहीत करने हेतु टैंकों, चेक-डैम और तालाबों आदि की व्यवस्था की जानी चाहिए। नुक्कड़ नाटकों, अखबारो तथा टेलीविजन आदि के माध्यम से लोगों में जागरूकता लानी होगी। जल संकट का चिकट वैश्वविक दौर चल रहा है। जल का कोई विकल्प भी नहीं है। जल की अनिवार्यता और अपरिहार्यता मनुष्य समेत सृष्टि के प्रत्येक जीव के लिए है। मानव का अस्तित्व जल पर ही निर्भर है। जल है तो जीवन है। भारतीय ज्ञान परंपरा यथा वेदों पुराणों उपनिषदों तथा अन्य भारतीय ग्रंथों में , बौद्ध जैन परंपराओं में नदी एवं जल संरक्षण के महत्त्वपूर्ण उपाय सुझाए गए हैं। नदी एवं जल संरक्षण के लिए इनका अनुकरण आवश्यक है ।
इस अवसर पर राजेंद्रगिरी गोस्वामी, डॉ. नमन तिवारी, अनिल अग्रवाल, निर्मल शर्मा, राकेश दुबे,शास्त्री नित्य गोपाल कटारे, सुभाष यादव भारती , सोनाली साहू, दीक्षा मेहर, रिचा शर्मा, उमेश साहू उपस्थित रहे । इस ज्ञान वर्धक संगोष्ठी में प्रदर्शनकरी कला के शोधार्थी शिवकांत वर्मा, रत्नेश साहू भी उपस्थित रहे। इस आयोजन में मंच पर डॉ. भारती के साथ अटल बिहारी वाजपाई हिंदी विश्व विद्यालय ने नाट्य विभाग के प्रभारी डॉ. रविन्द्र मुंडे भी उपस्थित रहे। आयोजन की अध्यक्षता राम मोहन परसाईं ने की, तथा संचालन डॉ. संतोष व्यास ने किया। सभा में उपस्थित सभी आगंतुकों को आभार रत्नेश साहू ने व्यक्त किया ।


