गोटेगांव धार्मिक स्थल परमहंसी गंगा आश्रम झोतेश्वर स्थित मेला ग्राउंड में ब्रह्मलीन द्विपीठाधीश्वर जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर श्रीमद् भागवत महा पुराण कथा सुनते हुए परमाराध्य परमधर्माधीशउत्तराम्नाय ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु परमपूज्य शंकराचार्य स्वामिश्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराजजी ने अपनी अमृत मय वाणी से धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहाकि यम का अर्थ है संयम और नियम का अर्थ है बारम्बारिता,भगवान् ने उद्धवजी के प्रश्नों का समाधान करते हुए उनकी प्रत्येक जिज्ञासाओं का समाधान संक्षेप में श्रीमद्भागवत महापुराण में प्रस्तुत किया है,योग रूपी कार्य के यम और नियम दो पैर बताए गए हैं,जिस प्रकार कोई मनुष्य बिना पैरों के नहीं चल सकता ऐसे ही योग की सिद्धि के लिए यम और नियम दो पैर जैसे हैं, जिसके जीवन में यम और नियम नहीं उसे पशु के समान कहा गया है, आजकल योग को प्रदर्शन की वस्तु मान लिया गया है,जबकि यह योग भौतिक न होकर आध्यात्मिक उन्नति का सोपान है,योग तभी सध सकता है जिसने जीवन में यम और नियम का पालन कर रखा है,पूज्य महाराजश्री ने मनुष्य शरीर की दुर्लभता को परिभाषित करते हुए कहाकि यह शरीर केवल हमारे कर्मों का परिणाम नहीं है,भगवान् की अकारण कृपा के कारण ही हमको यह शारीर प्राप्त होता है,जब भगवान् देखते हैंकि जीव निरन्तर ८४ लाख योनियों में भटकता ही चला जा रहा है तो उनके मन करुणा आ जाती है और वे कृपा करके दुर्लभ मनुष्य शरीर को प्रदान करते हैं,भगवत्प्राप्ति के इस अमूल्य साधन को पाकर भी जो मनुष्य अपना उद्धार नहीं करता वह आत्महत्यारे के समान है,पूज्यपाद शङ्कराचार्य जी महाराज के प्रवचन के पूर्व भगवान् को कर्मफल समर्पित करोगे तो अनन्त गुना होकर वापस भगवान् का नियम हैकि जो व्यक्ति भगवान् को अपने कर्मो का फल समर्पित कर देता है भगवान् उसे अनन्त गुना बनाकर वापस उसे ही लौटा देते हैं,यही कारण हैकि समझदार लोग भगवान् की पूजा करने के बाद,श्रीकृष्णार्पणमस्तु अथवा इदं न मम,कहकर कर्मफल भगवान् को समर्पित कर देते हैं, भगवान् का देना और लेना कोई देख नहीं पाताभगवान् जब देते हैं तो नारियल में जैसे पानी भरा हो वैसे देते हैं और जब लेते हैं तो कपित्थ फल के गूदे की तरह से ले लेते हैं,जैसेनारियल में पानी कैसे भरा यह कोई नहीं देख पाता वैसे ही कपित्थ के फल को जब हाथी खाता है तो समूचा फल उसके गोबर से बाहर निकल जाने पर भी उसका गूदा उसमें से गायब हो जाता है,यह गूदा बिना फल के कहीं से भी कटे गायब हो जाता है,ऐसे ही भगवान् का देना और लेना भी कोई नहीं देख पाता आगे पूज्यशंकराचार्यजी ने भगवान् के ऐश्वर्य और माधुर्य का वर्णन करते हुए कहाकि सर्व सम्पन्न भगवान् गोपियों से छछिया भर छाछ मांगकर उनको ऐश्वर्यसम्पन्न होने का अनुभव कराते हैं,भगवान् इस बात का तनिक भी अभिमान नहीं रखतेकि मैं कैसे इन सबसे छाछ मांगू? वे उनसे मांगकर स्वयं छोटे बन जाते हैं और गोपियों को देने वाला बनाकर आनन्दित करते हैं,पूज्य शंकराचार्यजी ने माखन चोरी का रहस्य बताते हुए कहाकि अनेक लोग यह प्रश्न उठाते हैंकि भगवान् ने चोरी क्यों की? वे कुछ और लीला भी कर सकते थे,चोरी अच्छी बात नहीं तो उन्होंने ऐसा क्यों किया? इस बात का समाधान करते हुए बतायाकि गोकुल में जो भी अच्छी वस्तुएं होती थी वह सब वहाॅ के ग्वाल बालकों को नहीं मिलती थी,कंस के डर से सभी लोग कर के रूप में सब मथुरा पहुँचा देते थे श्रीमद भागवत पुराण में बड़ी संख्या में गुरु भक्तों व श्रद्धालु बंधुओ ने उपस्थित होकर कथा का रसपान कर अपने मानव जीवन को धन्य बनाकर भागवत भगवान की कथा आरती के उपरांत महाभोग प्रसाद ग्रहण प्रसाद किया,चातुर्मास्य के अवसर पर पूज्य शङ्कराचार्य जी महाराज का गीता पर प्रवचन प्रातः 7.30 से 8.30 बजे तक भगवती राजराजेश्वरी मन्दिर में होता है
नरसिंहपुर है से अंकित नेमा की रिपोर्ट


