रिपोर्ट- महेन्द्र शर्मा बन्टी
डोंगरगढ़ – छत्तीसगढ़ लोधी समाज के प्रदेश संगठन चुनाव ऐतिहासिक उत्साह के साथ दुर्ग के रिसार्ट में हुआ। यह चुनाव ऐतिहासिक इसलिए रहा क्योंकि 623 मतदाताओं में से 599 ने अपने मत का प्रयोग किया। किसी भी चुनाव में इतनी अधिक भागीदारी होना अपने आप में समाज की जागरूकता का प्रमाण है और सबसे ज्यादा वोट “परिवर्तन पैनल” के मास्टर माइंड विष्णु लोधी ( कोषाध्यक्ष ) को प्राप्त हुआ । विष्णु लोधी ने ऐसा स्क्रिप्ट तैयार किया कि एकता पैनल को भनक भी नहीं लगा और 20 साल से जो समाज में काम कर रहे एकता पैनल का विकेट गिर गया। दरअसल एकता पैनल ने परिवर्तन पैनल को हल्के में लिया और उनको यह पता नहीं था कि इस परिवर्तन पैनल के पीछे मास्टरमाइंड कौन है ? जब उनको पता चला इसका मास्टरमाइंड विष्णु लोधी है तब तक समय निकल चुका था।इसलिए विष्णु लोधी ने अपना नाम चुनाव के ठीक 24 घंटे पहले लाया और ओ जब अपना नाम आगे किया तब ओ चुनाव जीत चुके थे उनके साथ उनकी टीम भी जित रही थी ये बात उनको पता था। सिर्फ औपचारिकता ही रह गई थी क्योंकि विष्णु लोधी चुनाव नहीं लड रहा था बल्कि विष्णु लोधी की तरफ से खुद समाज चुनाव लड रहे थे जो बदलाव चाहते थे तभी उनके चेहरे में सुबह से लेकर रिजल्ट आने तक मुस्कान ही मुस्कान था । क्योंकि उनको पता था वे जीत रहे हैं और उनके साथ उनकी टीम भी जित रही है । इस चुनाव से एक बात और ऊभरकर आई वह है अगर संगठन में न्याय दिखेगा नहीं तो मतदाता। हमेशा आपको बर्दाश्त नहीं करेगी। यदि आप न्यायपूर्ण विधान नहीं बनाते हैं तो मतदाता आपको बदल देगी।आने वाली पीढ़ी अधिक जागरूक है, वह अधिक समय तक अपने समाज को पिछड़ा नहीं देख सकेगी, वह अब बरसों तक इंतजार नहीं करेगी।
(क्यों हार गया एकता पैनल)
बहरहाल छत्तीसगढ़ लोधी समाज के प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर कमलेश्वर वर्मा ने बहुत लंबा कार्यकाल पूरा किया। उनकी तीन कार्यकाल में एक ही उपलब्धि दिखती है, वह है खैरागढ़ विधानसभा को लोधी बाहुल्य सीट होने का तिमगा, उन्होंने ही दिलाया और राजनीतिक पार्टियों को लोधी समाज से ही प्रत्याशी चुनने के लिए मजबूर किया। उनकी इस उपलब्धि के कारण ही समाज के लोगों ने इतने लंबे समय तक चुना। उन्हें लोकसभा की टिकट भी समाज के बूते ही हासिल हुई थी, लेकिन इतना बड़ा कार्यकाल पाने के बाद भी वे वह नहीं कर पाए, जो शायद कर सकते थे। जनता ने एकता पैनल को बुरी तरह से झटका दे दिया और प्रदेश अध्यक्ष के दावेदार मूलचंद लोधी और महामंत्री रमेश पटेल हारे और एकगुट का विशेषाधिकार भारी पड़ा। यह बात भी सच है कि आपके अच्छे कार्य आपको सफल तो बनाते हैं, लेकिन जब आप पूरे पैनल के साथ लड़ते हैं तो दूसरे साथियों की बुराईयां भी हमारे नतीजों पर प्रभाव डालती हैं। बहरहाल समाज ऐसा लगता है कि रमेश पटेल और मूलचंद ने अपने पिछले कार्यकाल में लोगों की उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाया।
*नए अध्यक्ष के लिए उम्मीदों को पूरा करना पहली चुनौती*
प्रदेश अध्यक्ष चुने गए अधिवक्ता घनश्याम प्रसाद वर्मा ने 326 वोट हासिल करके अपनी धाक जमा दी। उनके बीते सात सालों के परिश्रम का ही परिणाम कहा जा रहा है। जिस तरह से चुनाव में परिवर्तन का माहौल बना, उसे अनेक लोगों ने समर्थन दिया। मुझे लगता है कि उन्हें इस बात का भी फायदा मिला, जिसमें उनके हमनाम के दो और घनश्याम वर्मा अध्यक्ष के लिए पर्चा भरे थे। आमतौर पर विधानसभा जैसे चुनाव में इस तरह की कूटनीति अपनाई जाती है। जहां एक नाम के अन्य प्रत्याशी खड़े होने पर मतदाता भ्रमित हो जाते हैं, लेकिन लोधी समाज इस भ्रम में नहीं आया और एक प्रत्याशी को केवल सात और दूसरे को शून्य वोट हासिल हुए। यह संकेत भी है कि यदि इस तरह की भेद वाली नीति को जागरूक मतदाता बर्दाश्त नहीं करते। अब नए प्रदेश अध्यक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह रहेगी कि वह समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो दिलाए ही, साथ ही संगठन के लिए नए विधान-संविधान बनाए, जिससे समाज को लोगों का भरोसा और भागीदारी बढ़े।
*नए लोगों को मिला मौका*
इस चुनाव में विष्णु लोधी कोषाध्यक्ष चुने गए हैं। उनके इस पूरे चुनाव में सबसे अधिक वोट हासिल हुए हैं। उन्होंने 55 प्रतिशत ( 334 वोट) हासिल किया। उनके प्रतिव्दंदी परषोत्तम राजपूत को 251 वोट से संतोष करना पड़ा। नए कोषाध्यक्ष की पहचान शिक्षित , राजनीतिक,कृषक एवं सफल व्यवसायी (लोधी ट्रेव्हल्स & लोधी पेट्रोलियम ) के साथ साथ संयुक्त परिवार के रूप में भी है।जो आज के समय में अपने आप में एक मिशाल है। अच्छा संकेत यह है कि ऐसे सफल लोग समाज में आते हैं तो इससे समाज को ही फायदा होगा। समाज से ऐसे प्रतिष्ठित लोग जुड़ें, इसके लिए नई कार्यकारिणी को गंभीरता से विचार करना चाहिए। इस चुनाव में दो और प्रत्याशी थे, जिन्होंने बिना किसी पैनल के अपनी उपस्थिति का अहसास करा दिया। महामंत्री के लिए चैनदास जंघेल और फत्तेलाल चंदेल चुनाव जीतने लायक वोट तो हासिल नहीं कर पाए, लेकिन उनकी उपस्थिति ने दूसरे प्रत्याशियों का गणित बिगाड़ दिया। इन दोनों की पहचान लक्ष्य के जरिए रचनात्मक कार्य के कारण बनी है। अंकेक्षक पद पर विमल पटेल ने जीत दर्ज की, उनके निकटतम प्रतिव्दंदी अश्वनी राजपूत रहे। रायपुर से अरूण जंघेल संगठन मंत्री का चुनाव हार गए, जीवन कौशिक ने इसमें बाजी मारी। परन्तु समाज के गतिविधियों के लिहाज से राजधानी में प्रदेश संगठन का बड़ा पदाधिकारी होना ही चाहिए, इसकी कमी पूरी नहीं हो सकी है। लेकिन हो सकता है कार्यकारिणी बनाते समय राजधानी रायपुर को स्थान मिले।
वहीं विष्णु लोधी कोषाध्यक्ष प्रदेश लोधी समाज छत्तीसगढ़ ने चर्चा के दौरान कहा चुनाव तो होते रहेंगे और नए पदाधिकारी बनते रहेंगे, लेकिन उन्हें ही याद किया जाएगा, जो व्यवस्था में ठोस परिवर्तन करेंगे। समाज में कभी भी इतनी प्रतिस्पर्धा नहीं होनी चाहिए कि दूसरों की उपलब्धियां स्वीकार न हों। पिछली कार्यकारिणी के लोगों ने भी अपना तन-मन-धन लगाकर कार्य किये होंगे। उनके योगदान को भुलाना नहीं जा सकता। संगठन है तो नया-पुराना लगा ही रहेगा। गीता में भी इसे कहा गया है। जो कल तक पदाधिकारी था, वह आज पूर्व हो गया है। आज जो जीते हैं उनका कल पूर्व होना निश्चित है। समाज में समरसता और आपसी भाईचारा, एक-दूसरे के प्रति सम्मान बना ही रहना चाहिए। तभी तो समाज है, नहीं तो अकेले में जीने में क्या बुराई है। आगे विष्णु लोधी ने कहा आज समाज की आवश्यकता है कि हर गांव में जनगणना कराई जाए, उसके अनुपात में विभिन्न स्तर पर सगंठन बनाया जाए, पहले से बनी सगंठन को मात्री सगंठन से जोड़ा जाए, छात्र छात्रों को शिक्षा के लिए प्रेरित करना, बेरोजगार युवाओं को व्यवसाय के लिए प्रेरित करना, शिक्षा और व्यवसाय पर चर्चा,जो अलग ईकाई बना है उसे मात्री सगंठन में जोड़ना,समाज में आय के स्रोत को बढ़ाना प्रति घर मासिक चंदा के माध्यम से, समूहीक विवाह, किसी भी पदाधिकारी को अधिकतम एक कार्यकाल ही मिलना चाहिए, लेकिन समाज चाहें तो अच्छा कार्य के आधार पर निर्विरोध या चुनाव के माध्यम से दुसरी कार्यकाल दे सकती है ये सर्वसम्मति से समाज तै कर सकती है। युवाओं और महिलाओं की भागीदारी मनोनयन से नहीं बल्कि इसी तरह निर्विरोध या चुनाव के जरिए की जाए। इस तरह देखा जाए तो पूरे संगठन के आधारभूत ढांचे में आदि परिवर्तन की आवश्यकता है, ताकि अधिक से अधिक लोग समाज के संगठन से जुड़ने में गर्व महसूस कर सकें। अगर जनादेश के अनुरूप नतीजे नहीं मिले तो मतदाता परिवर्तन तो कर ही देती है, चाहे विलंब से ही क्यों न करे।


