पड़ी रेत खदानों पर एनजीटी की रोक के बावजूद रेत का अवैध खनन जारी,सत्तारूढ़ पार्टी के जनप्रतिनिधि बंद पड़ी रेत खदानों पर अवैध खनन को लेकर क्यो नही उठाते आवाज आखिर क्यों रहे मौन??…….
रिपोर्टर सीमा कैथवास
नर्मदापुरम । जिले भर में रेत खदानों पर उत्खनन को लेकर प्रतिबंध लगा हुआ है, वर्तमान में किसी भी ठेकेदार को रेत उत्खनन की परमिशन नहीं दी गई है। ऐसे में खदानों पर रसूखदार रेत माफिया हावी हैं जिन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। स्थिति इतनी गंभीर है कि यदि किसी अधिकारी ने किसी रसूखदार का डंपर पकड़ लिया तो उसे छोड़ने पर मजबूर होना पड़ता है? यही कारण है कि जनता द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि भी रेत के अवैध खनन के मामले को लेकर मौन है। सूत्रों की मानें तो रेत के अवैध कारोबार में लगे हुए अधिकांश ट्रैक्टर ट्राली रसूखदारो से जुड़ी हुई है। इसी कारण जवाबदार अधिकारी इक्का दुक्का रेत से भरी ट्रैक्टर ट्रालियां पड़कर जुर्माना की कार्यवाही कर इतिश्री करते हैं। सूत्रों की माने तो इन दिनों प्रशासन के अधिकारी भारी दबाव में काम कर रहे हैं, यदि वह कोई रेत से
भरा डंपर अथवा ट्रैक्टर ट्राली पकड़ते हैं तो भारी दबाव की चर्चाएं सुर्खियां बनती हैं। पिछले दिनों की बात करें तो 30 जुलाई को पवारखेड़ा सहित निमसाडिया खदान पर 1 दर्जन से अधिक डंपर में जेसीबी,लोडर से रेत चोरी की निरंतर मिल रही सूचना पर खनिज, राजस्व, पुलिस विभाग की संयुक्त कार्यवाही में सिर्फ 7 डंपर पकड़े गए थे। आखिर एनजीटी की रोक के बावजूद कैसे रसूखदार रेत माफिया इन खदानों पर अवैध खनन कर रहे हैं , यह भी एक बड़ा सवाल है?? पिछले दिनों अधिकारियों ने निमसाड़ियां खदान से एक डंपर पकड़ कर लाए थे जिसे कोई रसूखदार रेत माफिया जीतू कीर मंडी परिसर से अपने गुर्गों के माध्यम से प्रशासन के बीच ही उड़ा ले भागा था! यह मामला जिले के प्रभारी मंत्री तक संज्ञान में हैं। उल्लेखनीय है की 30 जुलाई को एसडीएम आशीष पांडे द्वारा अवैध रेत उत्खनन ,परिवहन की सूचना मिलने पर मगरिया पुल के पास बांद्राभान से “उड़ीसा पासिंग” डंपर क्रमांक ओडी 35 ई 5916 (12 चका)को रेत का अवैध परिवहन करते पकड़ा था, उसी दौरान एक अन्य बैतूल का डंपर क्रमांक एमपी 48 एच 1215 (10 चका)को भी रेत का अवैध परिवहन करते हुए पकड़ा था। जिनके पास उस दौरान कोई भी रॉयल्टी नहीं पाई गई थी। इसके बाद पकड़े गए डंपरों को अग्रिम कार्रवाई के लिए खनिज विभाग के सुपुर्द कर दिया गया था। जिला खनिज अधिकारी दिवेश मरकाम ने बताया कि पकड़े गए डंपरों को पुलिस अभिरक्षा में कृषि मंडी परिसर में खड़ा कराया गया है। और जिन पर वैधानिक कार्यवाही करते हुए जुर्माने की कार्यवाही की गई है। पकड़े गए डंपर के ऊपर 8 लाख से ज्यादा का जुर्माना किया गया है। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के तहत अब जुर्माना की कार्यवाही की जाती है। जिसमें उड़ीसा पासिंग डंपर पर 5 लाख 35 हज़ार का जुर्माना किया गया है। इसी प्रकार एमपी (बैतूल) पासिंग डंपर पर 2 लाख 90 हज़ार का जुर्माना किया गया है। दूसरी तरफ सूत्रों की माने तो एसडीएम द्वारा पकड़े गए डंपरों को छुड़ाने के लिए भारी दबाव प्रशासन पर बनाया गया था परंतु मीडिया की सक्रियता के चलते ऐसा संभव नहीं हो सका। वहीं प्रशासन ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए 8 लाख 25 हजार का जुर्माना दोनों डंपरो पर किया हुआ है जिसके बाद से रेत माफियाओं में हड़कंप मचा हुआ है। अब बड़ा सवाल यह खड़ा उठता है कि पिछले विधानसभा चुनाव में नर्मदापुरम की सोना बन चुकी रेत के अवैध खनन का मामला चुनावी मुद्दा बना था क्या यह फिर एक बार बनेगा? अवगत हो कि जिले में तवा नदी नर्मदा नदी सहित अन्य सहायक नदियों में 118 रेत खदान की स्वीकृति है। पिछली बार छत्तीसगढ़ की आरकेटीसी कंपनी द्वारा 262 करोड़ में रेत के खनन का ठेका लिया गया था परंतु रेत माफियाओं के रसूख और प्रशासन के असहयोग रवैए के चलते वह भी टारगेट पूरा नहीं कर सके और शासन को करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ा। यहां यह भी बताना जरूरी है कि कुछ माह पूर्व रायपुर पंचायत के सरपंच द्वारा भी उनके क्षेत्र में अवैध खनन का मामला उठाया गया था और क्षेत्रीय विधायक ने भी अवैध उत्खनन को लेकर उस दौरान आपत्ति दर्ज कराई थी। तब देहात पुलिस ने रेत के दो डंपरों सहित एक लोडर पर एफआईआर दर्ज की थी। वैसे जिले में पूर्व में रेत का ईटीपी घोटाला भी हो चुका है जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती हैं। जिसकी गाज तत्कालीन कलेक्टर शीलेंद्र सिंह तक पहुंची थी। उस दौरान बारिश के बीच देर रात एसडीएम रवीश श्रीवास्तव बाबई इटारसी बायपास मार्ग पर स्थित एक रेत के बड़े स्टॉक पर खड़े डंपरो की जांच करने पहुंचे थे, जिसके बाद कलेक्टर और एसडीएम आमने-सामने हुए थे और यह मामला प्रदेश स्तर तक सुर्खियां बना था। उस दौरान यह भी बात सामने आई थी कि जब प्रदेश स्तर से ही पोर्टल बंद है तो ई रॉयल्टी कैसे काटी जा रही है?? आखिर प्रदेश सरकार को हो रही करोड़ों रुपए की राजस्व हानि के विषय को लेकर जनप्रतिनिधि क्यों मौन है? पर भी बड़े सवाल खड़े होते हैं।


